इतिहास अध्याय–1 : यूरोप में राष्ट्रवाद | Class 10 History Notes (CBSE & Bihar Board)
यूरोप में राष्ट्रवाद
राष्ट्रवाद
- राष्ट्रवाद वह भावना है जिसमें लोग अपने देश, संस्कृति, भाषा और परंपराओं से प्रेम करते हैं और उसे आगे बढ़ाना चाहते हैं।
- यह भावना लोगों को एकजुट करती है और प्रेम, भाईचारा व एकता को बढ़ावा देती है।
- राष्ट्रवाद स्वतंत्रता और समानता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देता है।
- यूरोप में राष्ट्रवाद के विकास में फ्रांसीसी क्रांति और नेपोलियन के युद्धों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- 19वीं सदी में राष्ट्रवाद की भावना के कारण जर्मनी और इटली का एकीकरण हुआ।
- भारत में भी राष्ट्रवाद की भावना ने स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती दी और 1947 में देश को आज़ादी मिली।
- राष्ट्रवाद सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में दिखाई देता है।
- सकारात्मक राष्ट्रवाद देश की एकता, विकास और प्रगति को बढ़ावा देता है।
- नकारात्मक राष्ट्रवाद अन्य देशों या समुदायों के प्रति नफरत, भेदभाव और संघर्ष को जन्म दे सकता है।
यूरोप में राष्ट्रवाद की भावना की शुरुआत
- यूरोप में राष्ट्रवाद की भावना 18वीं और 19वीं शताब्दी में धीरे-धीरे विकसित हुई।
- इसकी शुरुआत को फ्रांसीसी क्रांति (1789) और नेपोलियन के युद्धों से जोड़ा जाता है।
- फ्रांसीसी क्रांति ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के विचारों को फैलाया, जिससे लोगों में राष्ट्रीय भावना बढ़ी।
- नेपोलियन बोनापार्ट ने यूरोप के कई क्षेत्रों पर कब्जा कर वहाँ ऐसे सुधार लागू किए, जिनसे राष्ट्रवाद की भावना मजबूत हुई।
- 19वीं सदी में इटली और जर्मनी का एकीकरण राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल है।
- इस समय कई यूरोपीय देशों में स्वतंत्रता संग्राम और क्रांतियाँ हुईं, जिससे राष्ट्रवादी आंदोलन और अधिक तेज हो गए।
सन 1815 ई. के वियना सम्मेलन और मेटरनिख की भूमिका
1815 का वियना सम्मेलन
- वियना सम्मेलन (1815) की मेजबानी ऑस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख ने की, जो एक प्रतिक्रियावादी नेता था।
- इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य नेपोलियन के युद्धों से उत्पन्न असंतुलन को समाप्त कर यूरोप में शांति और शक्ति संतुलन स्थापित करना था।
- ब्रिटेन, रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया ने मिलकर फ्रांस की क्रांति से फैली गणतांत्रिक और प्रजातांत्रिक विचारधारा को दबाने का प्रयास किया।
- सम्मेलन के बाद नेपोलियन युग का अंत हुआ और मेटरनिख युग की शुरुआत मानी गई।
मेटरनिख की भूमिका
- मेटरनिख यूरोप में राष्ट्रीयता और उदारवाद की भावना के कड़े विरोधी थे और उन्होंने इसे बढ़ने से रोकने की पूरी कोशिश की।
- उन्होंने फ्रांस में बूर्बो वंश को फिर से सत्ता में लाकर लुई 18वें को राजा बनाया।
- लुई 18वें ने स्थिति को समझते हुए जनता पर पूरी तरह पुरानी व्यवस्था नहीं थोपी और 1814 में संवैधानिक घोषणापत्र जारी किया, जो 1848 तक लागू रहा।
- बाद में चार्ल्स-X ने शासन में कठोर परिवर्तन किए, जिसके कारण असंतोष बढ़ा और अंततः 1830 की क्रांति हुई।
जुलाई 1830 की क्रांति
- जुलाई 1830 में फ्रांस में निरंकुश शासन के खिलाफ जनता ने बड़ा आंदोलन किया, जिससे बूर्बो वंश का शासन समाप्त हो गया और उदारवादी शासन की शुरुआत हुई।
- चार्ल्स-X ऐसा शासक था जो राष्ट्रीयता और लोकतंत्र को दबाना चाहता था।
- उसने पोलिग्नेक को प्रधानमंत्री बनाया, जिसने लुई-18 की समान नागरिक संहिता खत्म करके फिर से अमीर और कुलीन वर्ग को विशेष अधिकार देने की कोशिश की।
- उदारवादियों ने इसे जनता और लोकतंत्र के खिलाफ साजिश माना और विरोध शुरू किया।
- 25 जुलाई 1830 को चार्ल्स-X ने चार कठोर अध्यादेश जारी किए— प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त की गई, संसद को भंग किया गया और निर्वाचन प्रणाली में बदलाव किया गया।
- इन अध्यादेशों के कारण लोगों में गुस्सा फैल गया और पेरिस में विरोध हिंसक हो गया।
- 28 जुलाई 1830 से संघर्ष शुरू हो गया और हालात गृहयुद्ध जैसे बन गए।
- बढ़ते दबाव के कारण चार्ल्स-X को सिंहासन छोड़कर इंग्लैंड भागना पड़ा।
- बूर्बो वंश का अंत हुआ और सत्ता ऑर्लेअन्स वंश के हाथों में चली गई।
- लुई फिलिप नया राजा बना, जिसे उदारवादियों, पत्रकारों और जनता का समर्थन प्राप्त था।
- इस प्रकार, जुलाई 1830 की क्रांति ने फ्रांस में तानाशाही शासन को समाप्त कर लोकतांत्रिक शासन की नींव रखी।
1830 की क्रांति के प्रभाव
- 1830 की क्रांति से यूरोप में बड़े राजनीतिक और सामाजिक बदलाव हुए।
- फ्रांसीसी क्रांति ने अन्य देशों में भी स्वतंत्रता और संवैधानिक सुधारों को प्रेरित किया।
- फ्रांस में चार्ल्स X का शासन खत्म हुआ और लुई-फिलिप की संवैधानिक राजशाही बनी।
- बेल्जियम ने स्वतंत्रता पाई, और कई देशों में क्रांतिकारी आंदोलन बढ़े।
- जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई और उदारवादी विचारधारा फैली।
- इस क्रांति ने लोकतंत्र, स्वतंत्रता और राष्ट्रीयता के विचारों को मजबूत किया।
1848 की क्रांति
- सन् 1848 की क्रांति फ्रांस के राजा लुई फिलिप के खिलाफ हुई। लोग सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सुधार चाहते थे। इस क्रांति का असर कई यूरोपीय देशों पर भी पड़ा।
- लुई फिलिप मूल रूप से उदारवादी था, लेकिन धीरे-धीरे बहुत महत्वाकांक्षी और तानाशाही जैसा बनने लगा।
- उसने शासन में पूंजीपति वर्ग (धनवान लोगों) को ज्यादा महत्व दिया।
- सन् 1840 में उसने गीजो को प्रधानमंत्री बनाया, जो सुधारों के खिलाफ था और जनता की परेशानियों को नजरअंदाज करता था।
- उसके शासन काल में भुखमरी, महँगाई और बेरोजगारी बढ़ती गई, जिससे जनता नाखुश हो गई।
- 22 फरवरी 1848 को सुधारवादियों ने कियर्स के नेतृत्व में भोज (दावत) का आयोजन किया, जो विरोध प्रदर्शन में बदल गया।
- जनता ने जगह-जगह बैरिकेड बनाकर विरोध किया और पेरिस में आंदोलन तेज हो गया।
- 24 फरवरी 1848 को लुई फिलिप को सिंहासन छोड़कर इंग्लैंड भागना पड़ा।
- क्रांति के बाद नेशनल एसेम्बली ने फ्रांस को गणतंत्र घोषित कर दिया।
- 21 वर्ष से ऊपर के सभी पुरुषों को मतदान का अधिकार मिला।
- काम के अधिकार की गारंटी दी गई ताकि मजदूरों की स्थिति सुधर सके।
- गणतंत्रवादियों का नेतृत्व मार्टिन ने किया और सुधारवादियों का नेतृत्व लुई ब्लॉ ने, लेकिन दोनों में मतभेद हो गया।
- अंत में लुई नेपोलियन सत्ता में आया और आगे चलकर फ्रांस का सम्राट बना।
इटली का एकीकरण
19वीं शताब्दी की शुरुआत में इटली कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था। इन राज्यों पर ऑस्ट्रिया, फ्रांस और स्पेन जैसी विदेशी शक्तियों का प्रभाव था। विदेशी शक्तियाँ नहीं चाहती थीं कि इटली के लोगों में राष्ट्रीय एकता की भावना जागृत हो। धीरे-धीरे इटली के लोगों में राष्ट्रवाद की भावना बढ़ी और वे विदेशी शासन से मुक्त होकर एक संयुक्त राष्ट्र बनाने के लिए प्रयासरत हुए। मेज़िनी, काउंट कावूर और गैरीबाल्डी जैसे नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मेज़िनी और इटली का एकीकरण (प्रथम चरण)
मेज़िनी एक प्रसिद्ध साहित्यकार, क्रांतिकारी विचारक और गणतांत्रिक नेता थे। उन्होंने इटली को एक स्वतंत्र और संगठित गणराज्य बनाने का सपना देखा।
- 1820 में ‘कार्बोनारी’ नामक गुप्त संगठन से जुड़े।
- 1831 में “युवा इटली” संगठन की स्थापना की।
- 1834 में “यंग यूरोप” संगठन बनाया।
- 1833, 1834 और 1849 की क्रांतियों में नेतृत्व किया।
- उनके विचारों ने पूरे इटली में राष्ट्रीय चेतना फैलायी।
- गैरीबाल्डी, काउंट कावूर और विक्टर इमैनुएल द्वितीय जैसे नेता उनसे प्रेरित हुए।
काउंट कावूर और इटली का एकीकरण (द्वितीय चरण)
- काउंट कावूर सर्डिनिया–पिडमॉन्ट के प्रधानमंत्री थे।
- उन्होंने इटली के एकीकरण में निर्णायक भूमिका निभाई।
- कावूर ने ऑस्ट्रिया को सबसे बड़ी बाधा माना।
- उन्होंने फ्रांस से मित्रता की और क्रीमिया युद्ध (1853–1856) में सहयोग दिया।
- इस युद्ध में रूस की हार हुई, जिससे कावूर को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।
- ऑस्ट्रिया का हस्तक्षेप अनुचित ठहराया गया, जिससे एकीकरण आसान हुआ।
गैरीबाल्डी और इटली का एकीकरण (तृतीय चरण)
गैरीबाल्डी एक महान सेनानी और क्रांतिकारी नेता थे।
- उन्हें “इटली का तलवारबाज” कहा जाता है।
- 1860 में उन्होंने “लाल कुर्ती” सेना के साथ सिसिली और नेपल्स पर विजय प्राप्त की।
- इन क्षेत्रों को सर्डिनिया–पिडमॉन्ट के राजा विक्टर इमैनुएल II के अधीन कर दिया गया।
- 1870 में रोम पर कब्जा कर उसे इटली की राजधानी बनाया गया।
जर्मनी का एकीकरण
- 19वीं शताब्दी में जर्मनी लगभग 300 छोटे-बड़े राज्यों में बँटा हुआ था।
- इन राज्यों में राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक भिन्नताएँ थीं, जो एकीकरण में बाधा थीं।
- राष्ट्रवाद के उदय ने इन राज्यों को एकजुट करने की भावना को बल दिया।
- नेपोलियन और राष्ट्रवाद का प्रभाव — 1806 में नेपोलियन ने जर्मन प्रदेशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया और राइन संघ बनाया।
- जर्मन बुद्धिजीवियों और दार्शनिकों—हीगेल, कान्ट, हंबोल्ट और जैकब ग्रिम—ने राष्ट्रीय चेतना को विकसित किया।
- 1834 में प्रशा के नेतृत्व में जालवेरिन (Zollverein) की स्थापना हुई, जिसने आर्थिक एकता में सहूलियत दी।
- ऑटो वॉन बिस्मार्क ने 'लौह और रक्त' की नीति अपनाकर युद्ध और कूटनीति के माध्यम से जर्मनी को एकीकृत किया।
यूनान में राष्ट्रीयता का उदय
- यूनान (ग्रीस) लंबे समय तक ओटोमन साम्राज्य के अधीन था पर उसका गौरवशाली इतिहास लोगों में राष्ट्रवादी भावना जगाने वाला कारक था।
- 1821 में यूनान में स्वतंत्रता आंदोलन शुरू हुआ और यूरोप के कई बुद्धिजीवियों तथा राजनायिकों का समर्थन मिला।
- 1827 के नवारिनो युद्ध में टर्की-इजिप्टियन बलों के विरुद्ध ब्रिटेन, फ्रांस और रूस की संयुक्त मदद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- 1832 में यूनान को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया गया और ओटो को राजशाही दी गई।
हंगरी, पोलैंड और बोहेमिया में राष्ट्रवाद
- हंगरी में 19वीं सदी में राष्ट्रवाद की लहर चली; 1848 की क्रांति के समय लुईस कोसुथ जैसे नेता उभरे जिन्होंने स्वतंत्रता की माँग की।
- पोलैंड में 18वीं सदी के अंत में रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया द्वारा फिर-फिर से विभाजन के बावजूद लोग अपनी भाषा और संस्कृति बचाकर राष्ट्रवादी आंदोलन चलाते रहे; 1830 और 1863 में विद्रोह हुए।
- बोहेमिया (अब चेकोस्लोवाकिया क्षेत्र का हिस्सा) में भी 1848 के समय राष्ट्रीय चेतना और भाषा के पुनरुद्धार के कारण आंदोलन दिखे; बाद में उद्योगीकरण और भाषा-पुनर्जागरण से राष्ट्रवाद और मजबूत हुआ।
यूरोप में राष्ट्रवाद के परिणाम
- 1870 में इटली और 1871 में जर्मनी का एकीकरण हुआ।
- ऑस्ट्रो-हंगेरियन, ओटोमन और रूसी साम्राज्यों की स्थिति कमजोर हुई और अन्ततः कई क्षेत्रों में उनकी प्रभुता घटने लगी।
- 1830 और 1848 की क्रांतियों ने लोकतंत्र और स्वतंत्रता की माँग को बढ़ाया।
- यूरोपीय देशों ने उपनिवेश विस्तार के माध्यम से अपनी शक्ति दिखाने का प्रयास किया।
- बढ़ते राष्ट्रवाद और सैन्य-प्रतिस्पर्धा ने 1914 में प्रथम विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की।
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