इतिहास अध्याय–2 : समाजवाद एवं साम्यवाद | Class 10 History Notes (CBSE & Bihar Board)
समाजवाद एवं साम्यवाद
समाजवाद (Socialism)
- समाजवाद (Socialism) एक ऐसी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था है, जिसमें संपत्ति और उत्पादन के साधनों का नियंत्रण समाज या सरकार के हाथ में होता है, लेकिन निजी संपत्ति की अनुमति होती है।
- इसका उद्देश्य सामाजिक समानता, आर्थिक न्याय और संसाधनों का समान वितरण करना है।
- इसमें प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार और प्रत्येक को उसके कार्य के अनुसार वेतन दिया जाता है।
- यह पूंजीवाद की असमानताओं को समाप्त करने और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करने पर जोर देता है।
साम्यवाद (Communism)
- साम्यवाद एक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विचारधारा है, जिसका उद्देश्य एक वर्गहीन, शोषणमुक्त समाज की स्थापना करना है।
- इसमें उत्पादन के साधनों (जैसे भूमि, फैक्ट्री, संसाधन) का निजी स्वामित्व समाप्त कर सामूहिक स्वामित्व या सरकारी नियंत्रण में रखा जाता है।
- इसमें निजी संपत्ति का पूर्ण उन्मूलन होता है।
- इस विचारधारा की नींव कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने रखी, जिन्होंने "द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो" (1848) में इसका वर्णन किया।
- कार्ल मार्क्स के अनुसार, साम्यवाद में "प्रत्येक से उसकी क्षमता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार" का सिद्धांत लागू होता है।
- चीन, क्यूबा और उत्तर कोरिया जैसे देशों ने इसे अपनाया है।
समाजवाद और साम्यवाद में अंतर
- स्वामित्व – समाजवाद में सरकार मुख्य संसाधनों और उद्योगों का स्वामित्व रखती है, लेकिन निजी संपत्ति की अनुमति होती है। साम्यवाद में सभी संसाधन सामूहिक स्वामित्व में होते हैं और निजी संपत्ति समाप्त कर दी जाती है।
- आर्थिक प्रणाली – समाजवाद में धन का वितरण आवश्यकता और योग्यता के आधार पर होता है, जबकि साम्यवाद में सभी को समान रूप से दिया जाता है।
- राजनीतिक संरचना – समाजवाद में लोकतंत्र संभव होता है, जबकि साम्यवाद में आमतौर पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण रहता है।
- लक्ष्य – समाजवाद का उद्देश्य आर्थिक असमानता को कम करना है, जबकि साम्यवाद का लक्ष्य एक पूरी तरह समान समाज बनाना है।
- व्यवहारिकता – समाजवाद को कई देशों ने अपनाया है, लेकिन साम्यवाद को लागू करना कठिन रहा है।
समाजवाद की उत्पत्ति
- समाजवाद की उत्पत्ति 18वीं और 19वीं शताब्दी में यूरोप में हुई, जब औद्योगिक क्रांति के कारण अमीर और गरीब के बीच असमानता बढ़ने लगी।
- यह विचारधारा मजदूरों और गरीबों के हितों की रक्षा के लिए विकसित हुई, ताकि समाज में आर्थिक समानता लाई जा सके।
- समाजवाद की शुरुआती अवधारणाएँ रॉबर्ट ओवेन, सेंट साइमन और चार्ल्स फूरिए जैसे विचारकों ने दीं, जिन्हें "आदर्श समाजवादी" कहा जाता है।
- कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने वैज्ञानिक समाजवाद की नींव रखी और "द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो" (1848) में इसके सिद्धांतों को स्पष्ट किया।
यूटोपियन समाजवाद
- यूटोपियन समाजवाद समाजवाद की एक प्रारंभिक विचारधारा है, जो 19वीं शताब्दी की शुरुआत में विकसित हुई।
- यह अवधारणा एक आदर्श (यूटोपियन) समाज की कल्पना करती है, जहाँ सभी लोग समानता और सहयोग से रहते हैं।
- रॉबर्ट ओवेन, सेंट साइमन और चार्ल्स फूरिए इसके प्रमुख विचारक थे।
- यह विचारधारा मानवीय नैतिकता और सहयोग पर आधारित थी, न कि क्रांति या संघर्ष पर।
- हालांकि, इसे अव्यवहारिक माना गया क्योंकि यह आर्थिक और सामाजिक संरचना में बदलाव के ठोस उपाय प्रस्तुत नहीं कर सका।
- बाद में कार्ल मार्क्स ने इसे वैज्ञानिक आधार पर विकसित करने की आवश्यकता बताई और वैज्ञानिक समाजवाद की नींव रखी।
रॉबर्ट ओवेन
रॉबर्ट ओवेन एक ब्रिटिश उद्योगपति था। उसने स्कॉटलैंड के न्यू लुनार्क नामक स्थान पर एक फैक्ट्री की स्थापना की थी। इस फैक्ट्री में उसने श्रमिकों को अच्छी वैतनिक सुविधाएँ प्रदान की और फिर उसने ऐसा महसूस किया कि मुनाफा कम होने के बजाय और भी बढ़ गया था। अतः वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि संतुष्ट श्रमिक ही वास्तविक श्रमिक है।
कार्ल मार्क्स
- नाम – कार्ल मार्क्स (Karl Marx)
- जन्म – 5 मई 1818, ट्रायर, जर्मनी
- मृत्यु – 14 मार्च 1883, लंदन, इंग्लैंड
- परिचय – कार्ल मार्क्स एक जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और क्रांतिकारी विचारक थे, जिन्हें साम्यवाद (Communism) और वैज्ञानिक समाजवाद (Scientific Socialism) का जनक माना जाता है।
- प्रमुख रचनाएँ – द कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो (1848) और दास कैपिटल (1867)
- विचारधारा – उन्होंने वर्ग संघर्ष (Class Struggle) और सर्वहारा क्रांति (Proletarian Revolution) के सिद्धांत विकसित किए, जिनका उद्देश्य एक वर्गहीन समाज की स्थापना करना था।
- प्रभाव – उनके विचारों ने सोवियत संघ, चीन और कई अन्य देशों की राजनीतिक और आर्थिक नीतियों को प्रभावित किया।
कार्ल मार्क्स का सिद्धांत
- ऐतिहासिक भौतिकवाद – ऐतिहासिक भौतिकवाद कार्ल मार्क्स और एंगेल्स द्वारा विकसित एक सिद्धांत है, जो इतिहास को सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं और वर्ग संघर्ष के आधार पर समझाता है। यह मानता है कि समाज का विकास उत्पादन के साधनों और उत्पादन संबंधों से निर्धारित होता है। पूँजीपति और श्रमिक वर्ग के बीच संघर्ष इस सिद्धांत का केंद्रीय तत्व है, जो सामाजिक परिवर्तन को गति देता है। अंततः, यह पूँजीवाद से समाजवाद की ओर क्रांतिकारी बदलाव की भविष्यवाणी करता है।
- वर्ग संघर्ष – समाज मुख्य रूप से दो वर्गों में बंटा है: पूंजीपति (Bourgeoisie), जो उत्पादन के साधनों का स्वामी है, और श्रमिक वर्ग (Proletariat), जो श्रम करता है। इन दोनों के बीच संघर्ष समाज में बदलाव लाता है।
- सर्वहारा क्रांति – मार्क्स के अनुसार, श्रमिक वर्ग को पूंजीवादी शोषण से मुक्त होने के लिए क्रांति करनी होगी और एक वर्गहीन समाज की स्थापना करनी होगी।
- साम्यवाद – उत्पादन के साधनों का निजी स्वामित्व समाप्त कर सामूहिक स्वामित्व स्थापित किया जाए, जिससे सभी को उनकी आवश्यकता के अनुसार संसाधन मिलें।
- मूल्य का श्रम सिद्धांत – श्रमिकों द्वारा उत्पादित मूल्य (Value) से ही पूंजीपति लाभ (Profit) कमाते हैं, जो शोषण का मुख्य कारण है।
- राज्य की समाप्ति – जब वर्गहीन समाज स्थापित हो जाएगा, तो सरकार और राज्य की जरूरत नहीं रहेगी।
कार्ल मार्क्स और प्रथम एवं द्वितीय अंतरराष्ट्रीय संघ
प्रथम अंतरराष्ट्रीय संघ (First International – 1864)
- इसकी स्थापना 1864 में लंदन में हुई और कार्ल मार्क्स इसके प्रमुख विचारक थे।
- इसका उद्देश्य विभिन्न देशों के मजदूर संगठनों को एकजुट करना और पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष को संगठित करना था।
- मार्क्स ने इसमें वर्ग संघर्ष और सर्वहारा क्रांति के सिद्धांतों को प्रमुखता दी।
- 1876 में आंतरिक मतभेदों के कारण यह भंग हो गया।
द्वितीय अंतरराष्ट्रीय संघ (Second International – 1889)
- इसकी स्थापना 1889 में पेरिस में हुई, जब विभिन्न समाजवादी और श्रमिक दल एकजुट हुए।
- इसका उद्देश्य साम्यवाद और समाजवाद को बढ़ावा देना तथा मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष करना था।
- इसमें मे डे (1 मई) को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मान्यता दी गई।
- प्रथम विश्व युद्ध (1914) के दौरान सदस्य देशों के मतभेदों के कारण यह कमजोर पड़ गया और 1916 में समाप्त हो गया।
कार्ल मार्क्स के नेतृत्व में प्रथम अंतरराष्ट्रीय संघ ने मजदूर आंदोलन की नींव रखी, जबकि द्वितीय अंतरराष्ट्रीय संघ ने समाजवादी विचारधारा को और मजबूत किया।
1917 की बोल्शेविक क्रांति
1917 की बोल्शेविक क्रांति रूस के इतिहास में एक निर्णायक घटना थी, जो ज़ार निकोलस द्वितीय की तानाशाही शासन, प्रथम विश्व युद्ध की तबाही, आर्थिक संकट और श्रमिकों व किसानों में व्याप्त गहरे असंतोष का परिणाम थी। लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी ने इस क्रांति का नेतृत्व किया, जिसने न केवल ज़ारशाही को उखाड़ फेंका, बल्कि दुनिया की पहली समाजवादी सरकार की स्थापना की। मार्क्सवादी सिद्धांतों पर आधारित इस क्रांति ने पूँजीवादी व्यवस्था को चुनौती दी और सामाजिक असमानता को दूर करने का लक्ष्य रखा।
क्रांति के कारण
जार की निरंकुशता एवं अयोग्य शासन
- रूस में रोमनोव वंश का शासन था और ज़ार निकोलस द्वितीय निरंकुश शासक था।
- वह दैवी अधिकार में विश्वास करता था और जनता की समस्याओं से उदासीन था।
- प्रशासन भ्रष्ट, अयोग्य और अत्याचारी था, जिससे जनता में असंतोष फैलता गया।
किसानों की दयनीय स्थिति
- 1861 में कृषि दासता खत्म कर दी गई, लेकिन किसानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।
- छोटे खेत, पुरानी कृषि पद्धतियाँ, अत्यधिक कर और गरीबी ने उन्हें विद्रोह के लिए प्रेरित किया।
मजदूरों का शोषण
- औद्योगिक क्रांति के कारण शहरों में मजदूरों की संख्या बढ़ी, पर उन्हें कम मजदूरी और खराब कामकाजी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
- उन्हें कोई राजनीतिक अधिकार नहीं था और हड़ताल करने पर दमन किया जाता था।
रूसीकरण की नीति
- ज़ार ने पोल, फिन, यहूदी जैसी गैर-रूसी जातियों पर रूसी भाषा और संस्कृति थोप दी।
- इससे अल्पसंख्यकों में आक्रोश और विद्रोह की भावना फैल गई।
1905 की क्रांति और खूनी रविवार
- 1904-05 में जापान से युद्ध में हार ने ज़ारशाही की कमजोरी उजागर कर दी।
- 9 जनवरी 1905 को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी हुई, जिसे 'खूनी रविवार' कहा गया।
- इसके बाद 1905 की क्रांति हुई और ड्यूमा (संसद) बनी, लेकिन जार ने उसे प्रभावहीन बना दिया।
मार्क्सवाद का प्रभाव
- कार्ल मार्क्स के साम्यवादी विचारों ने बुद्धिजीवियों और श्रमिकों को प्रेरित किया।
- व्लादिमीर लेनिन ने बोल्शेविक पार्टी की स्थापना की, जिसका उद्देश्य मजदूर वर्ग की सत्ता स्थापित करना था।
प्रथम विश्व युद्ध की भूमिका
- प्रथम विश्व युद्ध में रूस की हार और आर्थिक तबाही ने जनता में आक्रोश बढ़ा दिया।
- सैनिकों और आम जनता का धैर्य टूट गया और उन्होंने विद्रोह कर दिया।
क्रांति का घटनाक्रम
फरवरी 1917 की रूसी क्रांति
- यह क्रांति रूस की राजधानी पेट्रोग्राड (अब सेंट पीटर्सबर्ग) में फरवरी 1917 में हुई थी।
- इस समय रूस पर ज़ार निकोलस द्वितीय का शासन था, जो निरंकुश और जनविरोधी था।
- प्रथम विश्व युद्ध ने रूस की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक हालत को बहुत खराब कर दिया था।
- लोग भुखमरी, बेरोज़गारी और युद्ध से परेशान थे, जिससे जनता में ज़ार शासन के प्रति गुस्सा बढ़ गया था।
- फरवरी में मजदूरों ने हड़ताल और प्रदर्शन शुरू किए, जिसमें सैनिकों ने भी उनका साथ दिया।
- ज़ार ने विरोध को कुचलने की कोशिश की, लेकिन सेना ने उसकी बात मानने से इनकार कर दिया।
- अंततः ज़ार निकोलस द्वितीय को सिंहासन छोड़ना पड़ा और 300 साल पुराना रोमानोव वंश समाप्त हो गया।
- इसके बाद रूस में एक अंतरिम (अस्थाई) सरकार बनी, जो अस्थायी रूप से सत्ता में आई।
अक्टूबर 1917 की रूसी क्रांति
- अक्टूबर 1917 की क्रांति के समय रूस की अंतरिम सरकार का नेतृत्व एलेक्ज़ेंडर केरेंस्की कर रहे थे।
- फरवरी 1917 की क्रांति के बाद ज़ार निकोलस द्वितीय ने गद्दी छोड़ दी थी और अंतरिम सरकार का गठन हुआ था। शुरू में इसका नेतृत्व प्रिंस ल्वॉव ने किया था, लेकिन जुलाई 1917 में एलेक्ज़ेंडर केरेंस्की प्रमुख(प्रधानमंत्री) बने।
- आम जनता इस अंतरिम सरकार से असंतुष्ट थी क्योंकि:
- यह सरकार प्रथम विश्व युद्ध को जारी रखना चाहती थी, जबकि जनता युद्ध से थक चुकी थी।
- मजदूरों को उचित वेतन और काम की सुविधा नहीं मिल रही थी।
- किसानों को ज़मीन नहीं दी जा रही थी और भुखमरी की स्थिति बनी हुई थी।
- सैनिक बिना कारण युद्ध में मारे जा रहे थे और अनुशासनहीनता फैल रही थी।
- इस सरकार ने पूंजीपतियों का पक्ष लिया और आम जनता की माँगों की अनदेखी की।
- इस क्रांति का नेतृत्व व्लादिमीर लेनिन और उनकी बोल्शेविक पार्टी ने किया।
- लेनिन ने "रोटी, शांति और ज़मीन" का नारा दिया, जो जनता की मुख्य समस्याओं को सीधे संबोधित करता था।
- उन्होंने मांग की कि सारी सत्ता मजदूरों और किसानों की सोवियत्स (सभाओं) को दी जाए।
- 24-25 अक्टूबर 1917 को बोल्शेविकों ने पेट्रोग्राड में सरकारी भवनों, टेलीफोन एक्सचेंज, रेलवे स्टेशन आदि पर कब्जा कर लिया।
- सबसे महत्वपूर्ण हमला विंटर पैलेस पर हुआ, जहाँ अंतरिम सरकार बैठी इसे गिराकर बोल्शेविकों ने सत्ता अपने हाथ में ले ली।
- इस प्रकार अक्टूबर 1917 की क्रांति ने रूस में कम्युनिस्ट शासन की नींव रखी।
- इसके बाद लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक सरकार बनी, जिसने ज़मीन किसानों में बाँटी, बैंकों और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया और रूस को प्रथम विश्व युद्ध से बाहर निकाल लिया।
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