इतिहास अध्याय–3 : हिन्द-चीन में राष्ट्रवादी आंदोलन | Class 10 History Notes (CBSE & Bihar Board)
हिन्द-चीन में राष्ट्रवादी आंदोलन
हिन्द चीन क्षेत्र
- हिन्द चीन क्षेत्र दक्षिण-पूर्व एशिया का एक महत्वपूर्ण भूभाग है।
- इसमें मुख्य रूप से वियतनाम, लाओस और कंबोडिया आते हैं।
- इसे "इंडोचाइना" भी कहा जाता है क्योंकि यह भारतीय और चीनी प्रभावों का मिश्रण है।
व्यापारिक कंपनियों का आगमन और फ्रांसीसी प्रभुत्व
- 1498 के बाद पुर्तगाली, डच, ब्रिटिश तथा फ्रांसीसीयों का आगमन हिन्द-चीन क्षेत्र में हुआ।
- इनका मुख्य उद्देश्य व्यापार करना था।
- लेकिन फ्रांसीसीयों ने यहां राजनीतिक प्रभुता कायम करने की कोशिश की।
- बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक उन्होंने संपूर्ण हिन्द-चीन को अपनी अधीनता में ले लिया।
फ़्रांस द्वारा उपनिवेश स्थापना का उद्देश्य
- भारत में ब्रिटिश और डच कंपनियों से व्यापारिक प्रतिस्पर्धा ।
- चीन में ब्रिटेन से व्यापारिक प्रतिस्पर्धा ।
- कच्चे माल की आपूर्ति एवं उत्पादित वस्तुओं के लिए बाजार की आवश्यकता।
- भारत और चीन की परिस्थितियों से निपटने हेतु एक नए उपनिवेश की आवश्यकता।
हिन्द-चीन क्षेत्र पर फ़्रांस का प्रभुत्व एवं उसका शोषण
- हिन्द-चीन के फ्रांस के अधीन आते ही फ्रांसीसियों ने सबसे पहले व्यापारिक नगरों और बंदरगाहों पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया ताकि व्यापार से होने वाला लाभ केवल फ्रांस को प्राप्त हो।
- ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों पर भारी कर लगाए गए और उनसे जबरन मजदूरी करवाई गई।
- कोयला, टीन, जस्ता, टंगस्टन और क्रोमियम जैसे खनिज संसाधनों का बड़े स्तर पर दोहन किया गया।
- मजदूरी पर बंधुआ मजदूरी जैसी एकतरफा अनुबंध व्यवस्था थोपी गई।
- शिक्षा में फ्रांसीसी भाषा अनिवार्य कर स्थानीय भाषा और संस्कृति को कमजोर किया गया।
- आम जनता को शिक्षा से दूर रखने की नीति अपनाई गई और स्कूल की अंतिम परीक्षा में स्थानीय छात्रों को जानबूझकर फेल किया जाता था।
हिन्द-चीन में राष्ट्रीयता का विकास
- 1905 में जापान ने रूस को पराजित किया, जिससे हिन्द-चीन के लोगों को एक एशियाई देश की शक्ति और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा मिली।
- इस जीत ने वहां के लोगों में आत्मविश्वास जगाया और राष्ट्रवादी चेतना को बल मिला।
- फ्रांसीसी दार्शनिक रूसो और मॉन्टेस्क्यू के विचारों ने भी हिन्द-चीनियों को जागरूक किया।
- इन विचारों ने स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र की भावना को प्रेरित किया।
- परिणामस्वरूप, फ्रांसीसी शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने की लहर तेज हो गई और स्वतंत्रता आंदोलन को गति मिली।
द्वितीय विश्वयुद्ध और वियतनामी स्वतंत्रत्ता
- 1940 में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान ने वियतनाम पर कब्ज़ा कर लिया।
- जापानी शासन के अत्याचारों के कारण वियतनामी जनता में असंतोष तेजी से बढ़ने लगा।
- हो ची मिन्ह के नेतृत्व में वियतनामी राष्ट्रवादियों ने वियत मिन्ह संगठन की स्थापना की।
- 1945 में जापान की हार के बाद हो ची मिन्ह ने वियतनाम की राजधानी हनोई में स्वतंत्रता की घोषणा की।
- लेकिन फ्रांस ने पुनः वियतनाम पर नियंत्रण करने की कोशिश की, जिसके परिणामस्वरूप पहला इंडो-चाइना युद्ध (1946–1954) शुरू हुआ।
- 1954 के जिनेवा समझौते के अनुसार वियतनाम को दो भागों उत्तरी वियतनाम और दक्षिणी वियतनाम में विभाजित कर दिया गया।
- उत्तर वियतनाम में रूस समर्थित हो ची मिन्ह का साम्यवादी शासन स्थापित हुआ, जबकि दक्षिण वियतनाम में अमेरिका समर्थित पूंजीवादी सरकार सत्ता में आई।
- यह विभाजन आगे चलकर वियतनाम युद्ध (1955–1975) का कारण बना।
- यह युद्ध अमेरिका और वियतनाम के बीच लम्बे संघर्ष के रूप में सामने आया।
- द्वितीय विश्वयुद्ध ने वियतनामी स्वतंत्रता आंदोलन को निर्णायक मोड़ प्रदान किया और इस घटना ने वियतनाम के संपूर्ण राजनीतिक इतिहास पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
वियतनाम में अमेरिकी हस्तक्षेप
- 1954 के जिनेवा समझौते के बाद वियतनाम को दो भागों में विभाजित किया गया - उत्तर वियतनाम (समाजवादी) और दक्षिण वियतनाम (पूंजीवादी)।
- साम्यवाद के प्रसार को रोकने की नीति के तहत अमेरिका ने दक्षिण वियतनाम को आर्थिक और सैन्य सहायता देना शुरू किया।
- अमेरिका को आशंका थी कि यदि उत्तर वियतनाम में साम्यवादी शासन मजबूत हुआ तो अन्य एशियाई देश भी साम्यवाद के प्रभाव में आ सकते हैं।
- अमेरिका ने युद्ध में लाखों सैनिक भेजे, लेकिन वियतकोंग ने छापामार युद्ध शैली अपनाकर अमेरिकी सेना को भारी नुकसान पहुँचाया।
- अमेरिका ने Napalm बम और Agent Orange जैसी रासायनिक गैसों का प्रयोग किया, जिससे व्यापक जनहानि, पर्यावरण विनाश और दीर्घकालिक बीमारियाँ फैलीं।
- इस युद्ध की अमेरिका के भीतर और पूरे विश्व में कड़ी आलोचना हुई; अमेरिकी जनता भी तेजी से युद्ध के विरोध में संगठित हो गई।
- बढ़ती आलोचना और युद्ध में भारी क्षति के कारण अमेरिका ने 1973 में अपनी सेना वियतनाम से वापस बुला ली।
- 1975 में वियतनाम का पुनः एकीकरण हुआ और साम्यवादी शासन की स्थापना हुई।
- यह युद्ध अमेरिका की सबसे लंबी, महंगी और असफल सैन्य कार्रवाई मानी जाती है।
- वियतनाम युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि विचारधारात्मक संघर्ष केवल हथियारों से नहीं जीता जा सकता।
होआ-होआ आंदोलन
- होआ-होआ एक बौद्ध धर्म से प्रेरित क्रांतिकारी आंदोलन था, जिसकी शुरुआत 1939 में हुइन्ह फू-सो ने की।
- यह आंदोलन फ्रांसीसी उपनिवेशवाद और अन्याय के विरुद्ध था।
- इसके अनुयायी कभी-कभी उग्रवादी कदम उठाते थे, जैसे आत्मदाह जैसी घटनाएँ।
- यह आंदोलन धार्मिक और राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक बन गया।
लाओस में गृहयुद्ध (Laos Civil War) (1959-1975)
- लाओस में 1959 से 1975 तक गृहयुद्ध शाही लाओ सरकार और कम्युनिस्ट पथेट लाओ के बीच हुआ।
- अमेरिका और थाईलैंड ने शाही सरकार का समर्थन किया, जबकि वियतनाम और सोवियत संघ ने पथेट लाओ को समर्थन दिया।
- यह युद्ध शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के अप्रत्यक्ष संघर्ष का हिस्सा था।
- अमेरिका चाहता था कि लाओस भी वियतनाम की तरह साम्यवादी न बने।
- इसलिए अमेरिका ने शाही लाओ सरकार को समर्थन और सहायता दी।
- 1975 में वियतनाम में अमेरिका की हार हो गई।
- इसके बाद 1975 में ही पथेट लाओ ने लाओस की राजधानी वियनतियान पर कब्जा कर शाही सरकार को अपदस्थ कर दिया और सत्ता पर कब्जा कर लिया।
- इस तरह शाही शासन का अंत हो गया और लाओस में साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई।
कम्बोडिया संकट (1954-1978)
- 1954 में कम्बोडिया स्वतंत्र हुआ और नरोत्तम सिंहानुक देश के शासक बने, जिन्होंने तटस्थ और गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई तथा अमेरिका के प्रभाव में आने से इनकार कर दिया।
- अमेरिका नाराज़ हो गया और दोनों देशों के संबंध बिगड़ते गए, यहाँ तक कि 1969 में अमेरिका ने हवाई जहाज से ज़हर छिड़ककर कम्बोडिया की रबर की फसल नष्ट कर दी।
- अमेरिका को डर था कि कम्बोडिया साम्यवादी देशों के साथ जुड़ जाएगा, इसलिए CIA ने सिंहानुक के विरोधियों की मदद की और 1970 में सिंहानुक को सत्ता से हटा दिया गया तथा अमेरिका समर्थित लोन नोल सरकार बनी।
- सिंहानुक चीन चले गए और निर्वासन से ही संघर्ष शुरू किया, जिसमें उन्हें वियतकोंग और उत्तरी वियतनाम का समर्थन मिला, जिसके कारण कम्बोडिया में युद्ध और हिंसा बढ़ती गई।
- अमेरिका ने दक्षिण वियतनाम से सेना भेजकर युद्ध में खुला हस्तक्षेप किया, जिससे कम्बोडिया में भारी बमबारी, मौतें और विनाश हुआ तथा दुनिया भर में इस युद्ध की आलोचना हुई।
- 1975 में लोन नोल भाग गए, युद्ध समाप्त हो गया और सिंहानुक फिर से राष्ट्राध्यक्ष बने, लेकिन 1978 में उन्होंने पद छोड़ दिया।
- इसके बाद पोल पॉट और खमेर रूज के चरमपंथी शासन की शुरुआत हुई, जिसमें लाखों लोगों की हत्या की गई और कम्बोडिया में अत्यधिक भय और आतंक का दौर छा गया।
वियतनामी गृह युद्ध और अमेरिका (1955-1975)
- वियतनामी गृह युद्ध उत्तर वियतनाम के साम्यवादी शासन और दक्षिण वियतनाम की अमेरिका समर्थित सरकार के बीच लड़ा गया।
- 1954 के जिनेवा समझौते के बाद वियतनाम दो भागों में बाँट दिया गया- उत्तर में हो ची मिन्ह के नेतृत्व में साम्यवादी सरकार बनी, जबकि दक्षिण को अमेरिका का समर्थन मिला।
- साम्यवाद को फैलने से रोकने के उद्देश्य से अमेरिका ने दक्षिण वियतनाम में सैनिक भेजकर अपना हस्तक्षेप लगातार बढ़ाया।
- 1964 में टॉन्किन की खाड़ी की घटना के बाद अमेरिका युद्ध में पूरी तरह उतर आया और बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाया।
- दक्षिण वियतनाम में वियेतकांग गुरिल्ला लड़ाकों ने छापामार युद्ध किया और 1968 में बड़े हमले किए, जिससे अमेरिकी सेना को भारी चुनौती मिली।
- अमेरिका ने Napalm और Agent Orange जैसे रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया, जिसके कारण लोगों की भारी मौतें हुईं और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुँचा।
- अंतरराष्ट्रीय आलोचना और भारी हानि झेलने के बाद 1973 में पेरिस समझौते के तहत अमेरिकी सेना वियतनाम से वापस लौट गई।
- 1975 में उत्तर वियतनाम ने दक्षिण पर कब्जा कर लिया, वियतनाम का पुनः एकीकरण हुआ और देश में साम्यवादी शासन स्थापित हो गया।
- यह युद्ध अमेरिका के लिए एक बहुत बड़ी हार साबित हुआ और इससे वियतनाम को मानव जीवन, संसाधनों और पर्यावरण सभी स्तरों पर भयंकर क्षति हुई।
अमेरिकी असफलता एवं वियतनाम का एकीकरण (1955-1975)
- द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वियतनाम उपनिवेशवाद और गृहयुद्ध की स्थिति में फँस गया, और 1954 के जिनेवा समझौते के अनुसार इसे अस्थायी रूप से उत्तर वियतनाम और दक्षिण वियतनाम में बाँट दिया गया।
- उत्तर वियतनाम में हो ची मिन्ह के नेतृत्व में साम्यवादी शासन था, जबकि दक्षिण वियतनाम में न्गो दिन दियम की अमेरिका समर्थित सरकार थी।
- उत्तर और दक्षिण दोनों को मिलाकर एकीकृत वियतनाम बनाने के लिए संघर्ष शुरू हुआ, क्योंकि दक्षिण की जनता दियम सरकार की तानाशाही और भ्रष्टाचार से असंतुष्ट थी।
- दक्षिण में वियत कॉन्ग नामक गुरिल्ला संगठन ने सरकार और अमेरिका के खिलाफ छापामार संघर्ष शुरू किया और उत्तरी वियतनाम का उसे मजबूत समर्थन मिला।
- साम्यवाद को रोकने के उद्देश्य से अमेरिका ने दक्षिण वियतनाम को सैन्य और आर्थिक सहायता भेजी तथा 1965 से अमेरिकी बमबारी और लाखों सैनिकों की तैनाती के साथ वियतनाम युद्ध तेज हो गया।
- भारी सेना और आधुनिक हथियारों के बावजूद अमेरिका कम्युनिस्ट सेनाओं को रोक नहीं सका, युद्ध लंबा चलने लगा और अमेरिकी जनता तथा विश्वभर में इस युद्ध का विरोध बढ़ गया।
- 1973 के पेरिस समझौते के बाद अमेरिका को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी, जिससे दक्षिण वियतनाम कमजोर हो गया।
- 30 अप्रैल 1975 को उत्तरी वियतनामी सेना ने दक्षिण की राजधानी साइगॉन पर कब्जा कर लिया और युद्ध समाप्त हो गया।
- 2 जुलाई 1976 को उत्तर और दक्षिण वियतनाम को मिलाकर आधिकारिक रूप से एक नया देश बना जिसका नाम रखा गया — सोशलिस्ट रिपब्लिक ऑफ वियतनाम।
- नवगठित देश की राजधानी हनोई बनी और साइगॉन का नाम बदलकर हो ची मिन्ह सिटी रखा गया।
वियतनाम में अमेरिकी असफलता के कारण
- वियतनामी जनता अपने देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता के लिए लड़ रही थी, इसलिए उन्हें मजबूत जनसमर्थन मिला और राष्ट्रवाद की भावना हो ची मिन्ह के नेतृत्व में बहुत मजबूत थी।
- वियतकोंग को स्थानीय ग्रामीण लोगों का पूरा सहयोग मिला, जिससे अमेरिकी सेना के लिए दुश्मन को पहचानना और युद्ध में बढ़त हासिल करना मुश्किल हो गया।
- वियतकोंग ने जंगलों में छिपकर गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई, जिसमें सुरंगों, घात लगाकर हमलों और अचानक पलटवार जैसी तकनीकों ने अमेरिकी सैन्य रणनीति को बार-बार विफल कर दिया।
- वियतनाम का घना जंगल, दलदली जमीन और गर्म मौसम अमेरिकी सैनिकों के लिए अनुकूल नहीं था, जिसके कारण वे थकान, तनाव और असुविधा के कारण प्रभावी ढंग से लड़ नहीं पाए।
- अमेरिका में युद्ध के विरुद्ध बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू हो गए, मीडिया ने युद्ध की भयावहता दिखाई, और युवाओं की भर्ती का व्यापक विरोध हुआ, जिससे अमेरिकी सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर पड़ गई।
- अमेरिका वियतनाम से बहुत दूर था, इसलिए सैनिकों और संसाधनों को लगातार भेजना अत्यधिक महंगा और कठिन होता गया, जिससे आर्थिक और सैन्य दबाव बढ़ गया।
- दक्षिण वियतनाम की सरकार, जिसका समर्थन अमेरिका कर रहा था, भ्रष्ट और जनता में अलोकप्रिय थी, इसलिए वहाँ की जनता उस सरकार के प्रति वफादार नहीं थी और इससे अमेरिका की पूरी नीति असफल हो गई।
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