इतिहास अध्याय–4 : भारत में राष्ट्रवाद | Class 10 History Notes (CBSE & Bihar Board)
भारत में राष्ट्रवाद
भारत में राष्ट्रवाद का उदय 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में हुआ। यह एक सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आंदोलन था, जिसने भारतीयों को एकजुट किया और स्वतंत्रता संग्राम को बल दिया।
भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारण:-
राजनीतिक कारण:
- 1858 में महारानी विक्टोरिया की घोषणा के बाद सभी भारतीय रियासतें ब्रिटिश शासन के अधीन आ गईं, जिससे भारतीयों के मन में राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता की भावना बढ़ने लगी।
- 1878 में लॉर्ड लिटन द्वारा लागू वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट ने भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों पर कठोर नियंत्रण स्थापित कर प्रेस की स्वतंत्रता पूरी तरह छीन ली। इस अत्याचारी कानून के कारण भारतीय जनता में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा आक्रोश और असंतोष फैल गया।
- 1879 के आर्म्स एक्ट के तहत भारतीयों के लिए हथियार रखना प्रतिबंधित कर दिया गया, जबकि अंग्रेजों को छूट दी गई, जिससे भारतीयों में स्वतंत्रता प्राप्त करने की इच्छा और अधिक प्रबल हुई।
- 1883 के इलबर्ट बिल में भारतीय तथा यूरोपीय व्यक्तियों को समान न्याय देने का प्रस्ताव था, लेकिन यूरोपीय विरोध के कारण इसे वापस ले लिया गया, जिससे भारतीयों को ब्रिटिश सरकार की नस्लीय नीति स्पष्ट दिख गई।
- 1905 में लॉर्ड कर्जन ने बंगाल को धार्मिक आधार पर बाँट दिया, जिससे भारत में अत्यधिक विरोध और स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। बाद में 1911 में यह विभाजन वापस लेना पड़ा, लेकिन इस घटना ने राष्ट्रवाद को मजबूत बनाया।
- 1910 के इंडियन प्रेस एक्ट ने प्रेस पर और कठोर नियंत्रण लगा दिया, जिससे भारतीय समाज में ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष और तेज़ी से बढ़ा।
- रेलवे, डाक और टेलीग्राफ जैसे परिवहन तथा संचार के साधनों के विकास से देश के दूर-दराज क्षेत्रों में संपर्क बढ़ा और भारतीयों के बीच एकता व राष्ट्रीय भावना मजबूत हुई।
- अंग्रेजी शिक्षा नीति के कारण भारतीयों में आधुनिक विचार, लोकतंत्र, आज़ादी और राष्ट्रवाद की समझ विकसित हुई, जिससे स्वतंत्रता संग्राम को वैचारिक आधार मिला।
आर्थिक कारण:
- अंग्रेजों ने किसानों से अत्यधिक लगान वसूला, जिसके कारण भारतीय किसानों को भारी आर्थिक संकट और गरीबी का सामना करना पड़ा।
- ब्रिटिश शासन ने भारतीय कपड़ों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसके परिणामस्वरूप बुनकर, कारीगर और कपड़ा उद्योग बर्बाद हो गए।
- ब्रिटिश सरकार ने भारत में औद्योगीकरण के विकास को जानबूझकर रोक दिया, ताकि ब्रिटेन के उद्योगों की बिक्री और मुनाफा बना रहे, जिससे भारत आर्थिक रूप से पिछड़ता गया।
- व्यापार संबंधी नीतियों में अंग्रेजों ने भारतीय व्यापारियों के साथ भेदभाव किया और यूरोपीय व्यापारियों को विशेष सुविधा दी, जिससे भारतीय व्यापारी प्रतिस्पर्धा में कमजोर हो गए।
- ब्रिटिश शासन ने भारत के प्राकृतिक और कृषि संसाधनों का अधिकतम शोषण किया, जिससे देश की संपत्ति लगातार बाहर भेजी जाती रही और भारत निर्धन होता गया।
- विदेशी वस्त्रों और यूरोपीय उत्पादों को बढ़ावा देने की नीति के कारण स्वदेशी उद्योगों को भारी नुकसान पहुँचा और लाखों लोग बेरोजगार हो गए।
- इन सभी आर्थिक नीतियों और शोषण के कारण भारतीयों में असंतोष बढ़ा और स्वतंत्रता तथा राष्ट्रवाद की भावना तेजी से मजबूत हुई।
सामाजिक कारण:
- ब्रिटिश सरकार की प्रजाति भेद नीति ने भारतीयों में असंतोष उत्पन्न किया।
- अंग्रेज स्वयं को श्रेष्ठ मानते थे और भारतीयों को हेय दृष्टि से देखते थे।
- विदेशों में भी भारतीयों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता था, विशेषकर दक्षिण अफ्रीका में।
- दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर अनेक कानूनी प्रतिबंध लगाए गए थे।
- भारत में रेलगाड़ी, क्लब, सड़क और होटलों में भारतीयों के साथ अपमानजनक व्यवहार होता था।
- इन घटनाओं से भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति घृणा और विरोध की भावना उत्पन्न हुई।
- सरकारी सेवाओं में अंग्रेजों की पक्षपातपूर्ण नीति भी एक प्रमुख कारण थी।
- ऊँचे पदों से भारतीयों को वंचित रखने का हर संभव प्रयास किया जाता था।
- प्रशासन का भार अधिकतर इंडियन सिविल सर्विस के अंग्रेज अधिकारियों के हाथों में था।
- सिविल सेवा की परीक्षा इंग्लैंड में आयोजित होने के कारण भारतीयों के लिए उसमें भाग लेना कठिन था।
- यदि कोई भारतीय सफल भी हो जाता, तो उसकी नियुक्ति में बाधा उत्पन्न की जाती थी।
- सुरेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे शिक्षित भारतीयों को भी नौकरी से निकाल दिया गया।
- इन कारणों से भारतीय शिक्षित वर्ग और मध्यम वर्ग में अंग्रेजी शासन के प्रति विरोध की भावना प्रबल हुई।
धार्मिक कारण:
- विश्व के कई देशों में धर्म सुधार आंदोलनों ने राष्ट्रवाद को जन्म देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- 19वीं शताब्दी में भारत में सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों के विरुद्ध एक आंदोलन की शुरुआत हुई।
- राजा राम मोहन राय, देवेन्द्र नाथ ठाकुर, ईश्वरचंद विद्यासागर, स्वामी दयानन्द सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द जैसे महापुरुषों ने इन आंदोलनों का नेतृत्व किया।
- इन सुधारकों ने भारतीय समाज में एकता, समानता और स्वतंत्रता का संदेश फैलाया।
- यूरोपीय विद्वान जैसे विलियम जोन्स, मैक्समूलर और चार्ल्स विल्किंसन ने भारतीय धर्मग्रंथों का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया।
- इससे भारतीयों के हृदय में अपने धर्म और संस्कृति के प्रति गौरव और निष्ठा की भावना जागृत हुई।
- धार्मिक और सामाजिक जागरूकता से भारतीयों में नई चेतना उत्पन्न हुई जिससे राष्ट्रवाद को बल मिला।
- 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना राष्ट्रवाद की एक महत्वपूर्ण परिणति थी।
- प्रारंभ में कांग्रेस केवल सुधारों की मांग कर रही थी, लेकिन 1914 तक ब्रिटिश दमनकारी नीति के कारण इसके नेता उग्र हो गए।
- बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चन्द्र पाल और लाला लाजपत राय (बाल-पाल-लाल) के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन ने गति पकड़ी।
- 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के साथ ही भारत को भी युद्धरत देश घोषित किया गया, जिससे राष्ट्रवादी भावनाएँ और तीव्र हुईं।
प्रथम विश्वयुद्ध के कारण और परिणाम का भारत से अंतर्संबंध
प्रथम विश्वयुद्ध 1914 से 1918 तक यूरोप के प्रमुख देशों के बीच लड़ा गया भीषण संघर्ष था। भारत ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था, इसलिए उसे मजबूरी में ब्रिटेन के पक्ष में युद्ध में शामिल होना पड़ा। लगभग 13 लाख भारतीय सैनिक विभिन्न मोर्चों पर भेजे गए, जिससे भारत की जनता और संसाधनों पर भारी बोझ पड़ा। इस युद्ध ने आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को बहुत गति प्रदान की।
भारत के युद्ध में शामिल होने के कारण
- भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, इसलिए उसे ब्रिटेन के समर्थन में युद्ध में भाग लेना पड़ा।
- किसानों, मजदूरों और व्यापारियों पर युद्ध व्यय के लिए भारी आर्थिक कर लगाए गए, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ा।
- भारतीय नेताओं को उम्मीद थी कि युद्ध के बाद ब्रिटेन भारत को स्वशासन और राजनीतिक अधिकार देगा।
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारत में महत्वपूर्ण घटनाएँ
- लगभग 13 लाख भारतीय सैनिक यूरोप, अफ्रीका और मध्य पूर्व के युद्ध मोर्चों पर भेजे गए।
- युद्ध खर्च के कारण सरकार ने करों में भारी वृद्धि की, जिसके परिणामस्वरूप जनता आर्थिक संकट से जूझने लगी।
- गदर आंदोलन और होमरूल आंदोलन को नई ऊर्जा मिली, जिससे राष्ट्रवादी भावना मजबूत हुई।
- 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता हुआ, जिसने हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया और आज़ादी के संघर्ष को मजबूत किया।
प्रथम विश्वयुद्ध के भारत पर प्रभाव
- युद्ध के बाद महंगाई, बेरोजगारी और खाद्यान्न संकट तेजी से बढ़ गया।
- ब्रिटेन ने स्वशासन के वादे पूरे नहीं किए, जिससे भारतीयों में गहरा असंतोष पैदा हुआ।
- 1919 में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट जैसे दमनकारी कानून लागू किए, जिसके विरोध में जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ।
- इन घटनाओं के परिणामस्वरूप महात्मा गांधी राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख नेता बनकर उभरे और 1920 में असहयोग आंदोलन की नींव रखी गई।
रॉलेट एक्ट के विरोध में सत्याग्रह
रॉलेट एक्ट
- 21 मार्च 1919 को रॉलेट एक्ट पारित किया गया, जो सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिश पर बनाया गया था।
- इस कानून के अनुसार सरकार किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए दो वर्ष तक जेल में रख सकती थी।
- प्रेस की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई और लोगों को बिना कारण बताए गिरफ्तार किया जा सकता था।
- इस अन्यायपूर्ण और दमनकारी कानून के कारण भारतीय नेताओं और जनता ने इसे ‘काला कानून’ कहा।
सत्याग्रह की शुरुआत
- महात्मा गांधी ने रॉलेट एक्ट के विरोध में देशभर में सत्याग्रह आंदोलन शुरू किया।
- 6 अप्रैल 1919 को सत्याग्रह दिवस मनाया गया, जिसमें बड़े पैमाने पर हड़तालें, उपवास और शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए गए।
- देश के कई शहरों में रेल, डाक और टेलीग्राम जैसी सेवाएं बाधित हो गईं, जिससे आंदोलन की व्यापकता दिखाई दी।
जलियांवाला बाग हत्याकांड
- 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हजारों लोग रॉलेट एक्ट के विरोध में शांतिपूर्वक सभा कर रहे थे।
- जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के भीड़ पर गोली चलवा दी।
- लगभग 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से ज्यादा घायल हुए, जिससे पूरा देश शोक और आक्रोश से भर उठा।
- यह घटना भारतीय इतिहास की सबसे क्रूर और दुखद घटनाओं में से एक मानी जाती है।
घटना के प्रभाव
- पूरे देश में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा आक्रोश फैल गया और अंग्रेजी सरकार की क्रूरता सभी के सामने उजागर हो गई।
- महात्मा गांधी राष्ट्रीय स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण नेता के रूप में उभरे।
- सत्याग्रह, अहिंसा और जनभागीदारी को स्वतंत्रता आंदोलन की ठोस दिशा मिली।
- इस घटना ने स्वतंत्रता संग्राम को मजबूत किया और आज़ादी के लिए जनता का समर्थन और अधिक व्यापक हो गया।
जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919)
- 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में बैसाखी के दिन हजारों स्त्री-पुरुष एक शांतिपूर्ण सभा के लिए एकत्र हुए थे।
- सभा का उद्देश्य रॉलेट एक्ट के विरोध तथा गिरफ्तार किए गए नेताओं की रिहाई की मांग करना था।
मुख्य घटना
- ब्रिटिश जनरल माइकल ओ’डायर ने बिना किसी चेतावनी के सभा पर गोली चलाने का आदेश दिया।
- जलियांवाला बाग चारों ओर से घिरा हुआ था और सैनिकों ने संकरे मुख्य द्वार को बंद कर दिया जिससे लोगों के पास बचकर निकलने का कोई रास्ता नहीं था।
- लगभग 10 मिनट तक मशीनगनों से लगातार गोलियाँ चलाई गईं, जिसके कारण मैदान में अफरा-तफरी और चीख-पुकार मच गई।
- सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 379 लोग मारे गए, लेकिन वास्तविक संख्या 1000 से भी अधिक मानी जाती है, और हजारों घायल हुए।
परिणाम और प्रभाव
- इस नरसंहार से पूरे देश में ब्रिटिश शासन के प्रति गहरा क्रोध उमड़ पड़ा और सरकार की क्रूरता सामने आ गई।
- रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस घटना के विरोध में अपना ‘नाइटहुड’ सम्मान वापस कर दिया।
- महात्मा गांधी का ब्रिटिश सरकार से अंतिम विश्वास भी समाप्त हो गया और उन्होंने असहयोग आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया।
- जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को अत्यधिक गति दी और जनता पहले से अधिक दृढ़ संकल्प के साथ आज़ादी की लड़ाई में जुड़ गई।
खिलाफत आंदोलन (1919-1924)
- खिलाफत आंदोलन भारत में मुस्लिम समुदाय द्वारा चलाया गया एक राजनीतिक और धार्मिक आंदोलन था, जिसका उद्देश्य प्रथम विश्वयुद्ध के बाद तुर्की के खलीफा की सत्ता और सम्मान की रक्षा करना था।
- मुसलमान खलीफा को इस्लाम धर्म का सर्वोच्च धार्मिक प्रमुख मानते थे, इसलिए ब्रिटिश द्वारा तुर्की पर कठोर शर्तें थोपने और खलीफा की शक्ति समाप्त करने से भारतीय मुसलमानों में गहरा असंतोष फैल गया।
खिलाफत आंदोलन शुरू होने के प्रमुख कारण
- प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की ने जर्मनी का साथ दिया, लेकिन जर्मनी की हार के बाद ब्रिटेन और उसके सहयोगियों ने तुर्की पर कठोर शर्तें लागू कर दीं।
- ब्रिटेन ने खलीफा की राजनीतिक शक्ति कमजोर कर दी और अंततः उसे सत्ता से हटाने की प्रक्रिया शुरू की, जिससे भारतीय मुसलमानों में रोष बढ़ गया।
भारत में आंदोलन की शुरुआत
- भारत में अली बंधु शौकत अली और मोहम्मद अली इस आंदोलन के प्रमुख नेता बने।
- 1919 में खिलाफत समिति की स्थापना की गई और अंग्रेजों से मांग की गई कि तुर्की के खलीफा की सत्ता को पुनः बहाल किया जाए।
गांधी जी का योगदान
- गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन को हिंदू-मुस्लिम एकता का अवसर माना और खुलकर इस आंदोलन का समर्थन किया।
- उन्होंने खिलाफत आंदोलन को असहयोग आंदोलन से जोड़ दिया, जिससे यह राष्ट्रीय स्तर के स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
आंदोलन का अंत
- 1924 में तुर्की के नेता मुस्तफा कमाल पाशा ने स्वयं ही खलीफा की पदवी समाप्त कर दी।
- खलीफा का पद हट जाने से आंदोलन का मुख्य उद्देश्य समाप्त हो गया और आंदोलन धीरे-धीरे कमजोर होकर समाप्त हो गया।
असहयोग आंदोलन (1920-1922)
असहयोग आंदोलन एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन था जो 1 अगस्त 1920 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू किया गया। इसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार का अहिंसक बहिष्कार करके स्वराज (स्वतंत्रता) प्राप्त करना था। यह आंदोलन रॉलेट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड और खिलाफत आंदोलन के समर्थन की प्रतिक्रिया के रूप में शुरू हुआ।
असहयोग आंदोलन शुरू होने के कारण
- रॉलेट एक्ट के तहत ब्रिटिश सरकार को बिना मुकदमा चलाए किसी भी व्यक्ति को जेल में बंद करने का अधिकार मिल गया था, जिसने भारतीयों में असंतोष बढ़ाया।
- जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) में निर्दोष नागरिकों पर की गई गोलीबारी ने पूरे देश को क्रोध से भर दिया।
- तुर्की के खलीफा की सत्ता बचाने के लिए चल रहे खिलाफत आंदोलन को गांधीजी ने समर्थन दिया और दो आंदोलनों को एक साथ जोड़ दिया।
- ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों और राजनीतिक अधिकारों के दमन के कारण जनता का धैर्य समाप्त होने लगा।
- 1920 में कांग्रेस ने स्वराज को अपना लक्ष्य घोषित किया और गांधीजी की अपील पर असहयोग आंदोलन शुरू किया गया।
असहयोग आंदोलन के प्रमुख कार्य
- भारतीयों ने ब्रिटिश शासन की नौकरियों, सरकारी पदों, विद्यालयों और विधायिका का बहिष्कार किया।
- विदेशी कपड़ों और सामान का व्यापक बहिष्कार किया गया और खादी तथा स्वदेशी वस्त्रों के उपयोग को बढ़ावा दिया गया।
- ब्रिटेन द्वारा दी गई उपाधियों और सम्मान को लोगों ने वापस लौटा दिया।
- भारतीय वकीलों ने ब्रिटिश अदालतों में पेश होना बंद कर दिया, जिससे न्याय व्यवस्था प्रभावित हुई।
- राष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अलीगढ़, बनारस और अन्य स्थानों पर स्वदेशी स्कूल और विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई।
- गांधीजी, मौलाना आजाद और अली बंधुओं जैसे नेताओं ने गांव–गांव जाकर जनता को संगठित किया और स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता फैलाई।
असहयोग आंदोलन का अंत
- 5 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरी–चौरा नामक स्थान पर आंदोलन उग्र हो गया, जहाँ भीड़ ने थाने में आग लगा दी और 22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो गई।
- गांधीजी अहिंसा में पूर्ण विश्वास रखते थे, इसलिए हिंसा की इस घटना के बाद उन्होंने असहयोग आंदोलन को तुरंत वापस लेने की घोषणा कर दी।
सविनय अवज्ञा आंदोलन
सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू किया गया एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन था। इसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के अन्यायपूर्ण कानूनों का शांतिपूर्ण उल्लंघन करके स्वतंत्रता की मांग को मजबूत करना था। यह आंदोलन नमक कानून के विरोध से शुरू हुआ और पूरे देश में फैल गया।
दांडी मार्च (नमक सत्याग्रह)
- सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत 12 मार्च 1930 को दांडी मार्च से हुई।
- गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक 240 मील (384 किमी) की पैदल यात्रा की।
- 6 अप्रैल 1930 को समुद्र तट पर नमक बनाकर ब्रिटिश नमक कानून का उल्लंघन किया गया, जिससे आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान मिली।
आंदोलन का विस्तार
- दांडी मार्च के बाद पूरे देश में लोगों ने ब्रिटिश कानूनों की अवज्ञा शुरू की।
- सरकारी नौकरियों, स्कूलों और विधायी संस्थाओं का बहिष्कार किया गया।
- विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार और स्वदेशी वस्त्रों का उपयोग बढ़ा।
- कई स्थानों पर करों के भुगतान को रोक दिया गया और जनता बड़ी संख्या में आंदोलनों में शामिल हुई।
ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया
- आंदोलन को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कठोर दमनकारी नीति अपनाई।
- हजारों स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार किया गया और गांधीजी को भी जेल भेजा गया।
गांधी–इरविन समझौता (1931)
- वायसराय लॉर्ड इरविन और गांधीजी के बीच 1931 में समझौता हुआ।
- आंदोलन को स्थगित किया गया और सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा किया गया।
- समझौते के बाद गांधीजी ने लंदन में गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण एवं परिणाम
सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण
- नेहरू रिपोर्ट (1928) की अस्वीकृति – कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की मांग की, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इसे ठुकरा दिया।
- नमक कानून – ब्रिटिश सरकार ने नमक पर कर लगाया, जिससे आम भारतीयों को परेशानी हुई।
- 1929 का लाहौर अधिवेशन – इस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज (पूर्ण स्वतंत्रता) की घोषणा की गई और आंदोलन की योजना बनाई गई।
- ब्रिटिश दमनकारी नीतियाँ – भारतीयों पर बढ़ते कर, नागरिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध और दमनकारी नीतियों ने आंदोलन की नींव रखी।
- गांधीजी की 11 मांगों की उपेक्षा – गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार को 11 मांगें भेजीं, जिनमें नमक कर हटाना, शराबबंदी, भू-राजस्व कम करना आदि शामिल था। सरकार ने इन मांगों पर ध्यान नहीं दिया, जिससे आंदोलन छेड़ा गया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के परिणाम
- गांधी-इरविन समझौता (1931) – गांधीजी और लॉर्ड इरविन के बीच समझौता हुआ, जिसमें आंदोलन समाप्त करने और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने की सहमति बनी।
- नमक कानून में ढील – सरकार ने भारतीयों को समुद्र से नमक बनाने की अनुमति दी, हालांकि कर पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
- ब्रिटिश दमनचक्र – आंदोलन के दौरान गांधीजी, नेहरू, पटेल समेत हजारों सत्याग्रही गिरफ्तार हुए।
- राष्ट्रीय चेतना का विस्तार – इस आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम को गांव-गांव तक पहुंचाया और महिलाओं, किसानों की भागीदारी बढ़ी।
- संविधान निर्माण की मांग तेज – भारत सरकार अधिनियम 1935 का निर्माण इसी आंदोलन के दबाव का परिणाम था।
- असफल गोलमेज सम्मेलन – गांधीजी ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में भाग लिया, लेकिन भारत को स्वतंत्रता देने के सवाल पर यह असफल रहा।
चंपारण आंदोलन 1917
चंपारण आंदोलन 1917 में बिहार के चंपारण जिले में हुआ और यह महात्मा गांधी का भारत में पहला सत्याग्रह था। यह आंदोलन उन किसानों को अत्याचार और शोषण से मुक्त कराने के लिए शुरू किया गया था जिन्हें अंग्रेज नील की जबरन खेती करने पर मजबूर करते थे। गांधीजी के नेतृत्व ने पहली बार किसानों को न्याय दिलाया और आंदोलन सफल रहा।
चंपारण आंदोलन के कारण
- अंग्रेज नील उत्पादकों ने किसानों पर तीनकठिया प्रथा लागू कर दी थी, जिसके तहत उन्हें अपनी जमीन के 3/20 हिस्से पर जबरन नील की खेती करनी पड़ती थी।
- नील की खेती कराने के बाद किसानों को बहुत कम मुआवजा मिलता था, जिससे वे आर्थिक रूप से बदहाल हो गए थे।
- जब बाजार में नील की मांग घटने लगी, तब भी जमींदार और अंग्रेज अधिकारियों ने किसानों पर अधिक कर लगाना शुरू कर दिया।
- इन अन्यायों से परेशान किसानों ने 1917 में गांधीजी से मदद मांगी।
चंपारण आंदोलन का घटनाक्रम
- किसानों की समस्या सुनने के बाद महात्मा गांधी चंपारण पहुंचे और गाँव–गाँव घूमकर किसानों के हालात का अध्ययन किया।
- गांधीजी ने सरकार से किसानों को शोषण से बचाने और तीनकठिया प्रथा समाप्त करने की मांग की।
- ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी को चंपारण छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन गांधीजी ने अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांत पर डटे रहे और आदेश मानने से इनकार कर दिया।
- जनता के बढ़ते समर्थन और सत्याग्रह के दबाव के कारण सरकार को झुकना पड़ा और चंपारण कृषि समिति गठित की गई, जिसमें गांधीजी को भी सदस्य बनाया गया।
- समिति की सिफारिश पर तीनकठिया प्रथा समाप्त की गई और किसानों को शोषण से बड़ी राहत मिली।
खेड़ा आंदोलन
खेड़ा आंदोलन 1918 में गुजरात के खेड़ा जिले में हुआ, जहाँ भीषण अकाल के बावजूद ब्रिटिश सरकार ने कर वसूलने की ज़िद की। किसानों की फसलें बर्बाद हो चुकी थीं, फिर भी सरकार ने राहत नहीं दी। किसानों ने गांधीजी, सरदार पटेल और अन्य नेताओं के नेतृत्व में कर न देने का अहिंसक फैसला किया। उन्होंने सत्याग्रह अपनाया और संपत्ति जब्त होने के बावजूद डटे रहे। अंततः सरकार को झुकना पड़ा और गरीब किसानों को कर माफी दी गई। यह आंदोलन किसानों की एकता और गांधीजी के नेतृत्व में अहिंसा की बड़ी जीत बना।
मोपला विद्रोह
मोपला विद्रोह 1921 में केरल के मालाबार क्षेत्र में हुआ, जहाँ मोपला मुस्लिम किसानों ने ब्रिटिश सरकार और हिंदू जमींदारों के अत्याचार के खिलाफ हथियार उठाए। ज़मींदार किसानों से भारी कर वसूलते थे और ब्रिटिश सरकार उनका समर्थन करती थी। खिलाफत और असहयोग आंदोलनों से प्रेरित होकर किसानों में विरोध की भावना बढ़ी। 20 अगस्त 1921 को विद्रोह शुरू हुआ, जिसमें सरकारी दफ्तरों और जमींदारों पर हमले हुए। बाद में यह आंदोलन सांप्रदायिक रूप ले बैठा। ब्रिटिश सरकार ने इसे क्रूरता से दबाया, जिसमें हजारों किसान मारे गए या जेल भेजे गए।
बारदोली सत्याग्रह
बारदोली सत्याग्रह 1928 में गुजरात के बारदोली क्षेत्र में हुआ एक शांतिपूर्ण किसान आंदोलन था। यह आंदोलन उस समय शुरू हुआ जब ब्रिटिश सरकार ने वहाँ 22% भू-राजस्व बढ़ा दिया, जबकि क्षेत्र में बाढ़ और सूखा पड़ा था। किसानों ने कर माफ़ी की माँग की, पर प्रशासन ने इनकार कर दिया। तब वल्लभभाई पटेल ने आंदोलन का नेतृत्व किया और किसानों को संगठित कर कर न देने की सलाह दी। सरकार ने ज़मीनें जब्त कीं, लेकिन किसानों ने हिंसा नहीं की। अंततः सरकार झुकी और कर वृद्धि वापस ली गई। इसी कारण पटेल को “सरदार” की उपाधि मिली।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना 28 दिसंबर 1885 को ए. ओ. ह्यूम के प्रयास से मुंबई में हुई थी। इसका उद्देश्य भारतीयों के अधिकारों की रक्षा करना और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाना था। पहले अधिवेशन में 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। शुरुआत में यह संगठन सरकार से सुधार की मांग करता था, लेकिन बाद में यह स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख संगठन बन गया। कांग्रेस ने देश में राजनीतिक जागरूकता फैलाई और ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन चलाकर उसने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की, जो अंततः 1947 में मिली।
वामपंथी/कम्युनिस्ट पार्टी
भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रभाव 20वीं शताब्दी की शुरुआत में पड़ा। रूस की क्रांति से प्रेरित होकर एम.एन. रॉय ने 1920 में ताशकंद में कम्युनिस्ट विचारधारा की शुरुआत की। 1925 में कानपुर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य समाजवाद लाना, ब्रिटिश शासन का विरोध करना और मजदूरों-किसानों के अधिकारों की रक्षा करना था। यह पार्टी पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ थी। स्वतंत्रता संग्राम में इसने भी भाग लिया। बाद में CPI विभाजित होकर कई वामपंथी दलों में बंट गई, लेकिन इसका मकसद समानता और श्रमिक कल्याण बना रहा।
मुस्लिम लीग
मुस्लिम लीग की स्थापना 30 दिसंबर 1906 को ढाका में नवाब सलीमुल्लाह की अध्यक्षता में हुई थी। इसका उद्देश्य मुस्लिमों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना था। पहले अध्यक्ष आगा खां बने। 1857 के बाद मुस्लिमों और अंग्रेजों के बीच अविश्वास था और 1905 के बंगाल विभाजन ने हिंदू-मुस्लिम तनाव बढ़ाया, जिससे मुस्लिमों को अलग संगठन की जरूरत महसूस हुई। मुस्लिम लीग शुरू में हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करती थी, लेकिन बाद में अलग निर्वाचक मंडल की मांग करने लगी। 1940 के बाद इसने पाकिस्तान की मांग शुरू की और विभाजन का समर्थन किया।
स्वराज पार्टी की स्थापना और उसका उद्देश्य
स्वराज पार्टी की स्थापना 1923 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुई थी। जिसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध करना और स्वशासन प्राप्त करना था। इसके प्रमुख नेता चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू थे।
स्वराज पार्टी की स्थापना
- 1922 में गांधीजी के असहयोग आंदोलन के अचानक बंद होने से कई नेता असंतुष्ट थे।
- चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस के भीतर एक अलग गुट बनाने का निर्णय लिया।
- 1 जनवरी 1923 को "भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस-स्वराज दल" के नाम से इस पार्टी की स्थापना हुई।
- इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के खिलाफ वैधानिक तरीकों से लड़ना था।
स्वराज पार्टी का उद्देश्य
- ब्रिटिश सरकार के दमनकारी कानूनों का विरोध करना।
- सरकारी संस्थानों में प्रवेश कर ब्रिटिश नीतियों को बाधित करना।
- भारतीयों को स्वशासन (डोमिनियन स्टेटस) दिलाने के लिए संवैधानिक संघर्ष करना।
- ब्रिटिश सरकार को मजबूर करना कि वह भारतीयों को प्रशासन में अधिक अधिकार दे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(RSS)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना 27 सितंबर 1925 को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। यह एक हिंदू राष्ट्रवादी संगठन है जिसका उद्देश्य हिंदू संस्कृति, एकता और देशभक्ति को बढ़ावा देना है। संघ की शाखाओं में स्वयंसेवकों को अनुशासन, सेवा और संगठन कौशल सिखाया जाता है। RSS शिक्षा, सेवा और आपदा राहत कार्यों में भी सक्रिय रहता है। इसकी विचारधारा से प्रेरित कई संगठन हैं जैसे—विहिप, बजरंग दल और ABVP। संगठन पर कई बार सांप्रदायिकता फैलाने के आरोप लगे, लेकिन इसे गांधी हत्या में निर्दोष पाया गया।
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