इतिहास अध्याय–5 : अर्थव्यवस्था एवं आजीविका | Class 10 History Notes (CBSE & Bihar Board)
अर्थव्यवस्था एवं आजीविका
अर्थव्यवस्था किसी भी देश की आर्थिक गतिविधियों का संचालक तंत्र होती है, जो उत्पादन, वितरण और उपभोग से जुड़ी होती है। आजीविका उन साधनों को दर्शाती है जिनके माध्यम से लोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था और वहां के नागरिकों की आजीविका एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी होती हैं।
किसी भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि और उद्योग होते हैं, जिन पर लोगों की आजीविका निर्भर करती है। औद्योगीकरण के कारण आधुनिक युग में उद्योगों का महत्व बहुत अधिक बढ़ गया है। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ब्रिटेन विश्व का पहला देश बना, जहाँ कृषि और उद्योगों में मशीनीकरण प्रारंभ हुआ और औद्योगिक क्रांति का एक नया युग शुरू हुआ।
औद्योगीकरण और आजीविका पर प्रभाव
औद्योगीकरण की विशेषताएँ:
- औद्योगीकरण के तहत उत्पादन मानव श्रम की जगह मशीनों से होने लगा।
- उत्पादन बड़े पैमाने पर हुआ, जिससे बड़े बाजारों की आवश्यकता बढ़ी।
- नए-नए मशीनों के आविष्कार और तकनीकी विकास से उद्योगों का विस्तार हुआ।
- औद्योगीकरण के लिए मशीनों के साथ-साथ पूंजी निवेश और श्रम का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा।
ब्रिटेन में औद्योगीकरण का प्रारंभ:
- 1750 तक ब्रिटेन मुख्य रूप से कृषि प्रधान देश था, जहाँ 80% जनसंख्या गाँवों में रहती थी।
- ग्रामीण कारीगर हाथ से चलने वाले यंत्रों द्वारा कपड़ा, ऊन, काँच, लोहा और मिट्टी के बर्तन बनाते थे।
- बढ़ती मांग के कारण व्यापारी गाँवों में गए और किसानों तथा मजदूरों को प्रशिक्षण देकर उनसे बड़े पैमाने पर उत्पादन करवाने लगे।
गिल्ड प्रणाली और कुटीर उद्योग का विकास:
- सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में शहरों में गिल्ड प्रथा का प्रचलन था, जिसमें निपुण उत्पादकों का व्यापार पर एकाधिपत्य था।
- बढ़ती मांग के कारण गिल्ड व्यापारियों ने गाँवों का रुख किया और कुटीर उद्योगों का विकास किया।
- पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं और बच्चों की भी भागीदारी बढ़ी, जिससे ग्रामीण रोजगार के अवसर बढ़े।
- ब्रिटेन के गाँवों में रंगाई और छपाई का कार्य किया जाता था, जिसके उत्पादों को उपनिवेशों में निर्यात किया जाता था।
आदि-औद्योगीकरण
- औद्योगीकरण से पहले भी कुटीर उद्योगों के माध्यम से उत्पादन हो रहा था।
- घरों में मानव श्रम से उत्पादन किया जाता था, जो धीरे-धीरे बड़े उद्योगों की ओर बढ़ा।
- यह दौर ‘आदि-औद्योगीकरण’ के रूप में जाना जाता है, जो औद्योगीकरण की नींव बना।
औद्योगीकरण के प्रमुख कारण
स्वतंत्र व्यापार और अहस्तक्षेप की नीति
- ब्रिटेन की सरकार ने व्यापार और उद्योग में न्यूनतम हस्तक्षेप किया।
- व्यापारियों को उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता महसूस हुई, लेकिन पुराने तरीकों से यह संभव नहीं था।
आवश्यकता आविष्कार की जननी:
- बढ़ती मांगों के कारण नई-नई मशीनों का आविष्कार हुआ।
- इसका सबसे बड़ा प्रभाव सूती वस्त्र उद्योग में देखा गया।
प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता:
- ब्रिटेन में कोयला और लोहे के विशाल भंडार उपलब्ध थे।
- इन संसाधनों से वाष्प इंजन और फैक्ट्री प्रणाली का विकास हुआ।
फैक्ट्री प्रणाली की शुरुआत:
- मशीनों और यंत्रों के आविष्कार ने कारखाना प्रणाली को जन्म दिया।
- इससे लिवरपूल और मैनचेस्टर जैसे नए औद्योगिक केंद्र विकसित हुए।
सस्ते श्रम की उपलब्धता:
- बाड़ाबंदी प्रथा (Enclosure Movement) के कारण भूमिहीन किसानों की संख्या बढ़ी।
- ये किसान शहरों में जाकर कम मजदूरी पर कारखानों में काम करने लगे।
सूत और वस्त्र उद्योग में नवाचार:
- रिचर्ड आर्कराइट – 'स्पिनिंग फ्रेम' (1769), जलशक्ति से चलता था।
- जेम्स हारग्रीव्स – 'स्पिनिंग जेनी' (1764), एक साथ 8 से 16 तकुए चलाती थी।
- जॉन के – 'फ्लाइंग शटल' (1773), जिससे बुनाई तेज हुई।
- सैम्यूल क्राम्पटन – 'स्पिनिंग म्यूल' (1779), बारीक सूत कातता था।
- एडमंड कार्टराइट – 'पावरलूम' (1785), जो वाष्प से चलता था।
- इन आविष्कारों ने सूती वस्त्र उद्योग को तेजी से बढ़ाया।
उपभोक्ता मांग में वृद्धि:
- नए उपनिवेशों और वैश्विक बाजारों में वस्त्र और अन्य वस्तुओं की मांग बढ़ी।
- ब्रिटेन ने कच्चे माल का आयात कर सस्ते में उत्पादन किया और तैयार वस्त्र महंगे दामों पर बेचे।
यातायात की सुविधा:
- बेहतर परिवहन प्रणाली, रेलवे और जहाजरानी उद्योग ने औद्योगीकरण में योगदान दिया।
- इससे कच्चा माल आसानी से फैक्ट्रियों तक और तैयार माल बाजारों तक पहुँचा।
वाष्प इंजन का विकास:
- जेम्स वॉट ने 1769 में वाष्प इंजन का आविष्कार किया।
- इसका उपयोग रेलवे इंजन और फैक्ट्री मशीनों में हुआ, जिससे उत्पादन बढ़ा।
औपनिवेशिक लाभ:
- ब्रिटेन के उपनिवेशों ने सस्ते कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित की।
- ब्रिटेन ने उपनिवेशों से कच्चा माल सस्ते में लेकर महंगे दामों पर तैयार माल बेचा।
उपनिवेशवाद और भारत पर उसका प्रभाव
ब्रिटेन में औद्योगीकरण के कारण उत्पादन बढ़ा, जिसके लिए नए बाजारों और कच्चे माल की आवश्यकता हुई। भारत, जो पहले एक समृद्ध व्यापारिक देश था, धीरे-धीरे ब्रिटिश उपनिवेशवाद के प्रभाव में आ गया। इसका भारतीय अर्थव्यवस्था, समाज और उद्योगों पर व्यापक प्रभाव पड़ा।
भारत पर उपनिवेशवाद का प्रभाव
हस्तशिल्प उद्योग पर प्रभाव:
- अठारहवीं शताब्दी में भारत का हस्तशिल्प उद्योग विश्व में सबसे विकसित था।
- ब्रिटिश गुमाश्ता एजेंट भारतीय कारीगरों से सस्ते में सामान खरीदकर इंग्लैंड भेजते थे।
- ब्रिटिश वस्त्र उद्योग को बढ़ावा देने के लिए भारतीय वस्त्र उद्योग पर भारी कर लगाए गए।
चार्टर एक्ट, 1813 और स्वतंत्र व्यापार नीति:
- 1813 में 'चार्टर एक्ट' लागू हुआ, जिससे ब्रिटेन ने भारत में स्वतंत्र व्यापार नीति अपनाई।
- ब्रिटिश कंपनियों को भारत में व्यापार करने की खुली छूट मिल गई।
- इससे भारतीय उद्योगों को भारी नुकसान हुआ और ब्रिटिश वस्त्रों का आयात बढ़ा।
निर्यात और आयात में असंतुलन:
- 1850 के बाद भारत से कच्चा माल सस्ते में खरीदा जाने लगा।
- ब्रिटेन में निर्मित वस्त्रों का आयात तेजी से बढ़ा, जिससे भारतीय कपड़ा उद्योग कमजोर हो गया।
- भारतीय किसानों को नकदी फसलों की खेती के लिए मजबूर किया गया, जिससे पारंपरिक कृषि व्यवस्था प्रभावित हुई।
रेलवे और व्यापारिक बुनियादी ढांचे का विकास:
- ब्रिटिश सरकार ने भारत में रेलवे का निर्माण किया ताकि व्यापार और निर्यात आसान हो सके।
- रेलवे के माध्यम से कच्चा माल आसानी से ब्रिटेन भेजा जाने लगा।
- हालांकि, यह भारतीय जनता के बजाय ब्रिटिश व्यापारियों के लिए अधिक लाभदायक साबित हुआ।
निरूद्योगीकरण और शहरीकरण:
- भारतीय कुटीर उद्योग धीरे-धीरे खत्म हो गए, जिससे कारीगर मजदूरी के लिए शहरों में पलायन करने लगे।
- इस प्रक्रिया को 'निरूद्योगीकरण' कहा गया, जिससे भारत का पारंपरिक उद्योग समाप्त हो गया।
- लाखों लोग बेरोजगार हो गए और औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था पर निर्भर हो गए।
औद्योगीकरण का परिणाम
औद्योगीकरण का प्रभाव भारत और दुनिया भर में गहरे और व्यापक रूप में देखा गया। 1850 से 1950 के बीच विभिन्न उद्योगों के विकास ने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया। इससे शहरों का विस्तार हुआ, पारंपरिक उद्योग कमजोर हुए और समाज में नए वर्ग बने।
औद्योगीकरण के प्रमुख परिणाम
नगरों का विकास:
- जमशेदपुर, सिन्द्री, धनबाद, डालमियानगर जैसे नए औद्योगिक शहर अस्तित्व में आए।
- इससे शहरीकरण की प्रक्रिया तेज़ हुई और लोग रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन करने लगे।
कुटीर उद्योग का पतन:
- बड़े उद्योगों के चलते पारंपरिक घरेलू और कुटीर उद्योग कमजोर पड़ गए।
- हस्तनिर्मित वस्तुएँ महंगी और अप्रासंगिक हो गईं, जिससे स्थानीय कारीगर बेरोजगार हुए।
साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विस्तार:
- बड़े पैमाने पर उत्पादन और संसाधनों की आवश्यकता के चलते यूरोपीय देशों ने उपनिवेशवाद को बढ़ावा दिया।
- इससे ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों का वैश्विक वर्चस्व बढ़ा।
समाज में वर्ग विभाजन:
- पूंजीपतियों, मध्यम वर्ग (बुर्जुआ) और मजदूर वर्ग का उदय हुआ।
- यह वर्ग विभाजन औद्योगिक समाज की मुख्य विशेषता बनी।
फैक्ट्री मजदूर वर्ग का जन्म:
- उद्योगों के विकास से एक नया मजदूर वर्ग उभरा, जो कारखानों में काम करने लगा।
- इन मजदूरों को कम वेतन और कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ा, जिससे उनका शोषण हुआ।
स्लम बस्तियों की शुरुआत:
- मजदूर वर्ग के लोग शहरों में रहने लगे और भीड़भाड़ वाले, अस्वास्थ्यकर इलाकों (स्लम) में बस गए।
- इससे स्वास्थ्य और सामाजिक समस्याएँ बढ़ीं।
कृषि और उद्योग में असंतुलन:
- पारंपरिक कारीगरी और शिल्प उद्योग के पतन से कृषि और उद्योग के बीच संतुलन बिगड़ गया।
- कई कारीगर और शिल्पकार खेती की ओर मजबूर हुए, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी बढ़ी।
मजदूरों की आजीविका
औद्योगीकरण के दौर में मजदूरों की आजीविका और उनकी स्थिति पर व्यापक प्रभाव पड़ा। पारंपरिक गृह उद्योगों के पतन और फैक्ट्री प्रणाली की स्थापना के बाद, बड़ी संख्या में कारीगर और श्रमिक अपनी आजीविका के लिए उद्योगपतियों के वेतन पर निर्भर हो गए।
मजदूरों की स्थिति
शोषण और अत्यधिक श्रम:
- मजदूरों, खासकर महिलाओं और बच्चों से 16-18 घंटे काम लिया जाता था।
- उन्हें न्यूनतम मजदूरी, अस्वस्थ वातावरण, और लंबे कार्य घंटे झेलने पड़ते थे।
- फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों का शारीरिक और मानसिक शोषण बढ़ता गया।
बेरोजगारी और कष्टमय जीवन:
- मशीनों और बड़े उद्योगों के कारण पुराने कारीगर और शिल्पकार बेरोजगार हो गए।
- पारंपरिक उद्योगों के पुनर्जीवित होने की संभावना कम थी, जिससे वे श्रमिक बनने पर मजबूर हुए।
आंदोलन और संघर्ष:
- मजदूरों का शोषण बढ़ने के कारण उनके बीच असंतोष बढ़ा।
- कई जगहों पर मजदूरों ने मशीनों को तोड़ा और फैक्ट्रियों के खिलाफ हिंसक विरोध किया।
- इंग्लैंड में 1830 से 1848 तक 'चार्टिस्ट आंदोलन' जैसे संगठित आंदोलन हुए।
मजदूर अधिकारों के लिए प्रयास:
- 1850 के बाद भारत में मजदूर वर्ग का गठन हुआ।
- मजदूरों की कठिनाइयों के कारण ब्रिटिश सरकार पर दबाव बना, जिससे 1881 में 'फैक्ट्री एक्ट' पारित हुआ।
- इस अधिनियम में बच्चों और महिलाओं के काम के घंटे तय किए गए।
श्रमिक संगठनों का गठन:
- मजदूरों की स्थिति सुधारने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए 1920 में 'अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस' की स्थापना हुई।
- 1926 में 'मजदूर संघ अधिनियम' पारित हुआ, जिससे पंजीकृत श्रमिक संघों को मान्यता दी गई।
स्वतंत्रता के बाद सुधार:
- स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी श्रमिकों की स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ।
- 1948 में 'न्यूनतम मजदूरी कानून' (Minimum Wages Act) पारित हुआ, जिससे मजदूरों की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए कदम उठाए गए।
- बाद में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से मजदूरों के जीवन स्तर को सुधारने के प्रयास किए गए।
Comments
Post a Comment