इतिहास अध्याय–8 : प्रेस, संस्कृति एवं राष्ट्रवाद | Class 10 History Notes (CBSE & Bihar Board)
प्रेस, संस्कृति एवं राष्ट्रवाद
प्रेस (छापाखाना) का महत्व
- आज के समय में प्रेस के बिना आधुनिक दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती।
- यह जीवन के हर क्षेत्र—ज्ञान, सूचना, मनोरंजन और रोजगार—को प्रभावित करता है।
- पहले लोग घटनाओं की जानकारी समय पर नहीं पा पाते थे।
- सूचना के अभाव में लोग तर्क और मानवता से वंचित रहते थे।
- इसी ज़रूरत ने छापाखाने के आविष्कार को जन्म दिया।
- यह आविष्कार धीरे-धीरे हुआ, लेकिन इसका प्रभाव बहुत बड़ा था।
- छापाखाने ने सोचने के तरीके में क्रांति ला दी।
- इसने समाज की जीवनशैली को नया रूप दिया।
- यह आग, पहिया और लिपि की तरह मानव जीवन की एक महत्वपूर्ण खोज है।
- प्रेस ने लोगों में जागरूकता, शिक्षा और आत्मविश्वास को बढ़ाया।
मुद्रण का इतिहास गुटेनबर्ग तक
- प्राचीन मानव ने गुफाओं और चट्टानों पर चित्र बनाकर विचार व्यक्त किए।
- बाद में मिट्टी की टिकियों और लकड़ी के ब्लॉकों से छपाई शुरू हुई (ब्लॉक प्रिंटिंग)।
- 105 ई. में चीन में कागज का आविष्कार हुआ, जिससे मुद्रण को बढ़ावा मिला।
- 594 ई. से चीन में लकड़ी के ब्लॉकों से पुस्तकें और मुद्रा छापी जाने लगी।
- 1041 ई. में पि-शेंग ने मिट्टी के मूवेबल टाइप विकसित किए।
- 13वीं सदी में कोरिया ने धातु के मूवेबल टाइप का उपयोग शुरू किया।
- चीन में सिविल सेवा परीक्षाओं के कारण मुद्रण उद्योग तेजी से बढ़ा।
- 16वीं-17वीं सदी में शहरीकरण और शिक्षा के प्रसार ने मुद्रण को और बढ़ाया।
- इन प्रगतियों के कारण यूरोप में 15वीं सदी में गुटेनबर्ग ने आधुनिक छापाखाना बनाया।
- गुटेनबर्ग की छपाई प्रणाली ने मुद्रण क्रांति को जन्म दिया
यूरोप में मुद्रण क्रांति और गुटेनबर्ग का योगदान
यूरोप में मुद्रण का आगमन
- ब्लॉक प्रिंटिंग 13वीं सदी में रेशम मार्ग से यूरोप पहुँची।
- मार्को पोलो और मिशनरियों ने इसे फैलाने में भूमिका निभाई।
- प्रारंभ में ताश के पत्ते और धार्मिक चित्र छापे जाते थे।
गुटेनबर्ग की क्रांति (1430 के दशक)
- 1336 में जर्मनी में कागज मिलों की स्थापना हुई।
- योहान्स गुटेनबर्ग ने धातु के मूवेबल टाइप और प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किया।
- 1455 में गुटेनबर्ग बाइबिल छपी – यह ज्ञान क्रांति की शुरुआत थी।
गुटेनबर्ग और प्रिंटिंग प्रेस
जन्म एवं पृष्ठभूमि
- जन्म: जर्मनी के मेन्ज़ शहर में।
- पृष्ठभूमि: किसान-व्यापारी परिवार, यांत्रिकी का अच्छा ज्ञान।
महत्वपूर्ण आविष्कार
- धातु के मूवेबल टाइप – सीसा + टिन + विस्मथ की मिश्रधातु।
- तेल-आधारित स्याही – जल स्याही से बेहतर, स्पष्ट छपाई।
- हैंडप्रेस – दो प्लेटों वाला यंत्र, जिसमें टाइप और कागज रखकर छपाई होती थी।
प्रमुख कार्य
- 1440 – प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार।
- 1455 – 42-लाइन बाइबिल छपी (पहली मशीन-छपी पुस्तक)।
- बाद में 36-लाइन बाइबिल भी छपी।
प्रभाव एवं विवाद
- साझेदारों (फस्ट व शॉफर) ने प्रेस पर कब्जा कर लिया।
- फिर भी तकनीक यूरोप के कोलोन, रोम, पेरिस और इंग्लैंड तक फैल गई।
- इंग्लैंड में विलियम कैक्सटन ने इसे अपनाया।
भारत में प्रेस का आगमन एवं विकास
प्रारंभिक चरण
- 16वीं सदी में पुर्तगाली मिशनरियों ने भारत में पहला प्रिंटिंग प्रेस स्थापित किया।
- 1579 में पहली तमिल पुस्तक छपी।
समाचार पत्रों का उदय
- 1780: बंगाल गजट (जेम्स ऑगस्टस हिक्की) भारत का पहला अखबार, परंतु ब्रिटिश सरकार द्वारा दबा दिया गया।
- 1816: गंगाधर भट्टाचार्य का बंगाल गजट (भारतीयों द्वारा पहला समाचार पत्र)।
- राजा राममोहन राय ने संवाद कौमुदी (1821) और मिरात-उल-अखबार (1822) जैसे पत्रों से सामाजिक-धार्मिक सुधारों को बढ़ावा दिया।
राष्ट्रवादी भूमिका
- अमृत बाजार पत्रिका, केसरी (बाल गंगाधर तिलक), और हिंदू पैट्रियट जैसे पत्रों ने ब्रिटिश विरोधी भावना को प्रज्वलित किया।
प्रेस की विशेषताएँ: समयानुसार परिप्रेक्ष्य में
1. 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में प्रेस की भूमिका
- सीमित प्रभाव – उस समय जनता की राजनीति में रुचि कम थी, इसलिए समाचार पत्रों का प्रसार सीमित था। पत्रकारिता आर्थिक रूप से घाटे का व्यवसाय था।
- सामाजिक-धार्मिक सुधार – राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारकों ने संवाद कौमुदी (1821, बंगाली) और मिरात-उल-अखबार (1822, फारसी) जैसे पत्रों के माध्यम से सती प्रथा, जातिगत भेदभाव और धार्मिक कुरीतियों की आलोचना की।
- सरकारी उदासीनता – अंग्रेज़ प्रशासक प्रारंभ में भारतीय प्रेस को गंभीरता से नहीं लेते थे, क्योंकि इसका जनमत पर सीधा प्रभाव नहीं था।
2. 1857 के बाद प्रेस का विभाजन
एंग्लो-इंडियन प्रेस –
- यह ब्रिटिश हितों का समर्थक था और "फूट डालो और शासन करो" की नीति का पोषक।
- सरकारी विज्ञापन और समर्थन प्राप्त था, जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया (1861), स्टेट्समैन (1875)।
भारतीय प्रेस –
- राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित, अंग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं में प्रकाशित।
- सोम प्रकाश (1858, बंगाली), अमृत बाजार पत्रिका (1868), और केसरी (1881, मराठी) जैसे पत्रों ने ब्रिटिश शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई।
3. राष्ट्रीय आंदोलन में प्रेस की भूमिका
जनजागरण –
- बाल गंगाधर तिलक ने केसरी और मराठा के माध्यम से "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है" का नारा दिया।
- महात्मा गांधी ने यंग इंडिया और हरिजन से असहयोग आंदोलन और सत्याग्रह का प्रचार किया।
सामाजिक-आर्थिक मुद्दे –
- प्रताप (कानपुर) और हिंदू पैट्रियट ने किसानों-मजदूरों के शोषण को उजागर किया।
- स्वदेशी आंदोलन और आर्थिक शोषण (धन के निष्कासन) की आलोचना।
सांप्रदायिक एकता –
- अल-हिलाल (मौलाना आजाद) और कामरेड (मोहम्मद अली) ने हिंदू-मुस्लिम एकता का समर्थन किया।
4. ब्रिटिश दमन और प्रेस अधिनियम
- वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878) – लॉर्ड लिटन ने देशी भाषाओं के पत्रों पर सेंसरशिप लगाई।
- समाचार पत्र अधिनियम (1908) – क्रांतिकारी लेखन पर प्रतिबंध।
- भारतीय प्रेस अधिनियम (1910) – सरकार को पत्रों को जब्त करने का अधिकार।
5. स्वतंत्रता के बाद प्रेस की भूमिका
- लोकतंत्र का चौथा स्तंभ – भ्रष्टाचार, सामाजिक अन्याय और सरकारी नीतियों पर नज़र रखना।
- सामाजिक परिवर्तन – दहेज, बाल विवाह, और लैंगिक असमानता जैसे मुद्दों को उठाना।
- मनोरंजन और शिक्षा – खेल, विज्ञान, और साहित्य को बढ़ावा देना।
Comments
Post a Comment