कक्षा 10
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6.जनतंत्र का जन्म Notes

काव्य खंड - अध्याय 6: जनतंत्र का जन्म

गोधूलि भाग-2 (कविता - रामधारी सिंह दिनकर)

पाठ परिचय: प्रस्तुत कविता 'जनतंत्र का जन्म' में राष्ट्रकवि दिनकर ने भारतीय जनता की शक्ति का जयघोष किया है। यह कविता 26 जनवरी 1950 (गणतंत्र दिवस) के ऐतिहासिक अवसर को ध्यान में रखकर लिखी गई थी, जिसमें राजतंत्र (राजा का शासन) के अंत और जनतंत्र (जनता का शासन) के उदय की घोषणा की गई है।

1. कवि परिचय: रामधारी सिंह दिनकर

परिचय: 'राष्ट्रकवि' रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को सिमरिया, बेगूसराय (बिहार) में हुआ था।

महत्वपूर्ण बिंदु:
  • युग: वे छायावादोत्तर (छायावाद के बाद के) युग के प्रमुख कवि थे।
  • प्रमुख रचनाएँ: 'उर्वशी', 'रश्मिरथी', 'संस्कृति के चार अध्याय', 'कुरुक्षेत्र'।
  • सम्मान: 'संस्कृति के चार अध्याय' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और 'उर्वशी' के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। उन्हें 'पद्म भूषण' से भी सम्मानित किया गया।
  • निधन: 24 अप्रैल 1974 ई.।

2. जनता की हुंकार: सिंहासन खाली करो

सदियों की नींद टूटी: कवि कहते हैं कि सदियों से बुझी हुई राख अब सुगबुगा उठी है। जो जनता मिट्टी की मूरत की तरह चुप थी, अब वह जाग गई है।

घोषणा: "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।"
कवि राजाओं और शासकों को चेतावनी देते हैं कि अब समय बदल गया है। समय के रथ का पहिया (नाद) सुनो और गद्दी छोड़ो, क्योंकि अब जनता शासन करने आ रही है।

3. जनता की शक्ति

(क) अबोध मूरत नहीं

शासक जनता को 'फूल' या 'दूधमुंही बच्ची' समझते थे, जिसे जंतर-मंतर (खिलौनों) से बहलाया जा सकता है। लेकिन कवि कहते हैं कि जब यही जनता क्रोध में भौंहें तानती है, तो धरती हिलने लगती है और तूफान आ जाते हैं।

(ख) तैंतीस कोटि (33 करोड़)

कवि ने 33 करोड़ भारतीय जनता (उस समय की आबादी) के सिर पर मुकुट धरने की बात कही है। जनता की हुंकार इतनी तेज है कि महलों की नींव भी उखड़ जाती है।

4. असली देवता कौन?

कवि कहते हैं कि देवताओं को मंदिरों में मत ढूँढो। असली देवता तो:

  • सड़कों पर: गिट्टी तोड़ते हुए मिलेंगे।
  • खेतों में: हल चलाते हुए मिलेंगे।
फावड़े और हल: कवि घोषणा करते हैं कि अब राजा का राजदंड (Sceptre) सोने या चांदी का नहीं होगा, बल्कि 'फावड़े और हल' ही नए भारत के राजदंड बनेंगे। अब धूल से सने हुए मजदूर ही सोने का ताज पहनेंगे।

परीक्षा सारांश (Exam Highlights)

  • समय का नाद: रथ के पहियों की आवाज़ (Ghar-Ghar Naad)।
  • अभिषेक: कवि के अनुसार अब राजा का नहीं, बल्कि 'प्रजा' (जनता) का अभिषेक होने वाला है।
  • दूधमुंही: शासक जनता को अबोध बच्ची (दूधमुंही) समझते थे।
  • गवाक्ष: खिड़की (जनता की सांसों के बल से ताज उड़ते हैं और खिड़कियाँ (गवाक्ष) भी हिल जाती हैं)।

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