कक्षा 10
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5.नागरी लिपि Notes

अध्याय 5: नागरी लिपि

गोधूलि भाग-2 (निबंध - गुणाकर मुले)

पाठ परिचय: प्रस्तुत निबंध 'नागरी लिपि' (देवनागरी) के ऐतिहासिक विकास और इसके विस्तार को दर्शाता है। यह निबंध गुणाकर मुले की प्रसिद्ध पुस्तक "भारतीय लिपियों की कहानी" से लिया गया है।

1. लेखक परिचय: गुणाकर मुले

परिचय: गुणाकर मुले का जन्म 1935 ई. में महाराष्ट्र के अमरावती जिले में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मराठी में हुई, लेकिन उन्होंने हिंदी में विपुल लेखन किया।

विशेषताएँ:
  • वे विज्ञान और इतिहास के अंतर्संबंधों पर लिखने वाले प्रमुख लेखक थे।
  • प्रमुख रचनाएँ: 'अक्षरों की कहानी', 'भारत: इतिहास और संस्कृति', 'ब्रह्मांड परिचय', 'भारतीय विज्ञान की कहानी'।
  • निधन: 2009 ई. में।

2. 'नागरी' नाम कैसे पड़ा?

'नागरी' नाम की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं:

  • गुजरात के नागर ब्राह्मण: कुछ विद्वान मानते हैं कि गुजरात के 'नागर ब्राह्मणों' ने सबसे पहले इसका प्रयोग किया, इसलिए इसका नाम नागरी पड़ा।
  • नगरों (काशी) से संबंध: एक अन्य मत के अनुसार, बाकी नगर केवल 'नगर' हैं, लेकिन काशी (बनारस) को 'देवनगरी' कहा जाता है। अतः काशी में प्रयुक्त होने के कारण इसका नाम 'देवनागरी' पड़ा।

3. लिपि का इतिहास और विस्तार

(क) कब शुरू हुई?

भारत में नागरी लिपि के स्पष्ट लेख 10वीं-11वीं सदी से मिलने लगते हैं। लेकिन इसके शुरुआती रूप 8वीं सदी से ही दिखने लगे थे।

यह ब्राह्मी लिपि से विकसित हुई है। 12वीं सदी तक यह पूरे उत्तर भारत की लिपि बन गई थी।

(ख) दक्षिण भारत में (नंदिनागरी)

नागरी लिपि केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं थी। दक्षिण भारत में इसे 'नंदिनागरी' कहा जाता था।

प्रमाण:
  • विजयनगर के राजाओं के लेख।
  • राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग का लेख।
  • चोल राजाओं के सिक्कों पर नागरी अक्षर।

4. शासकों द्वारा प्रयोग (सिक्के)

विदेशी और मुस्लिम शासकों ने भी अपनी मुद्रा (सिक्कों) पर नागरी लिपि का प्रयोग किया, जो इसकी व्यापकता को दर्शाता है:

  • महमूद गजनवी (11वीं सदी): लाहौर के टकसाल से जारी चाँदी के सिक्कों पर अरबी के साथ-साथ नागरी लिपि में भी लेख अंकित थे।
  • मुहम्मद गौरी: इसके सिक्कों पर 'लक्ष्मी' की आकृति और नागरी लिपि में 'मुहम्मद अवतार' लिखा मिला है।
  • बादशाह अकबर: इनके कुछ सिक्कों पर नागरी लिपि में 'सियाराम' अंकित है।

परीक्षा सारांश (Exam Highlights)

  • निबंध का स्रोत: 'भारतीय लिपियों की कहानी' पुस्तक।
  • नंदिनागरी: दक्षिण भारत में नागरी लिपि का नाम।
  • सर्वदेशिक लिपि: 8वीं से 11वीं सदी के बीच यह पूरे देश (उत्तर-दक्षिण) में फैल गई थी, इसलिए इसे 'सार्वदेशिक लिपि' कहा गया।
  • दोहा-कोश: सरहपाद की रचना (10वीं सदी), जो पुरानी हिंदी/अपभ्रंश की शुरूआती झलक देती है।

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