2.प्रेम-अयनि श्री राधिका Notes
काव्य खंड - अध्याय 2: प्रेम-अयनि श्री राधिका
गोधूलि भाग-2 (सवैया/दोहा - रसखान)
पाठ परिचय: प्रस्तुत पाठ में कृष्ण भक्त कवि रसखान के दोहे और सवैये संकलित हैं। पहले पद 'प्रेम-अयनि श्री राधिका' में राधा-कृष्ण के प्रेममय रूप का वर्णन है, और दूसरे पद 'करील के कुंजन ऊपर वारौं' में ब्रजभूमि के प्रति उनका गहरा समर्पण दिखता है।
1. कवि परिचय: रसखान
परिचय: रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहिम था। उनका जन्म दिल्ली के पठान राजवंश में (अनुमानित 1533-1558 के बीच) हुआ था।
महत्वपूर्ण बिंदु:
- धर्म परिवर्तन: वे मुस्लिम थे लेकिन कृष्ण भक्ति में इतने लीन हुए कि गोस्वामी विट्ठलनाथ ने उन्हें पुष्टि मार्ग की दीक्षा दी।
- स्थान: वे दिल्ली से भागकर ब्रजभूमि (वृंदावन) चले गए और वहीं बस गए।
- रचनाएँ: 'प्रेमवाटिका' (1610 ई.) और 'सुजान रसखान'।
- विशेषता: भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इनके बारे में कहा था- "इन मुसलमान हरिजनन पै कोटिन हिंदू वारिये।"
2. प्रथम पद: प्रेम-अयनि श्री राधिका
दोहा और सोरठा: इसमें कवि ने राधा और कृष्ण को प्रेम का साक्षात रूप माना है।
व्याख्या के मुख्य बिंदु:
- माली-मालिन: कवि कहते हैं कि प्रेम रूपी वाटिका (बगीचे) के दो माली और मालिन 'राधा' और 'कृष्ण' हैं।
- चोर: श्री कृष्ण को 'चितचोर' (मन चुराने वाला) कहा गया है। कवि कहते हैं कि जब से मैंने कृष्ण की मोहिनी सूरत देखी है, मेरा मन मेरे बस में नहीं रहा, जैसे धनुष से छूटा हुआ तीर वापस नहीं आता।
- बेमन: कवि कहते हैं कि मैं बिना मन के (बेमन) हो गया हूँ क्योंकि मेरा मन तो कृष्ण ने चुरा लिया है।
3. द्वितीय पद: करील के कुंजन ऊपर वारौं
सवैया (Savaiya): इस पद में रसखान ब्रजभूमि के प्रति अपना सर्वस्व त्यागने की इच्छा प्रकट करते हैं।
समर्पण भाव:
- लकुटी और कामरिया: कृष्ण की लाठी (लकुटी) और कंबल (कामरिया) के लिए कवि तीनों लोकों का राज (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) त्यागने को तैयार हैं।
- आठों सिद्धि, नवों निधि: नंद बाबा की गाय चराने के सुख के आगे वे आठों सिद्धियों और नौ निधियों का सुख भी भूलने को तैयार हैं।
- करील के कुंजन: कवि ब्रज की कांटेदार झाड़ियों (करील के कुंजन) के लिए करोड़ों सोने के महलों (कलधौत के धाम) को भी न्योछावर कर देना चाहते हैं।
परीक्षा सारांश (Exam Highlights)
- अयनि (Ayani): का अर्थ है 'खजाना' या 'गृह'। राधा प्रेम का खजाना हैं।
- मनमानिक: यहाँ कृष्ण को मन रूपी 'माणिक' (रत्न) ले जाने वाला कहा गया है।
- सवैया छंद: रसखान सवैया छंद के सिद्धहस्त कवि थे।
- भाव: रसखान का प्रेम लौकिक (सांसारिक) से शुरू होकर अलौकिक (ईश्वरीय) भक्ति में बदल गया।
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