12.कर्णस्य दानवीरता Notes
संस्कृत (पीयूषम्)
द्वादशः पाठः : कर्णस्य दानवीरता
बिहार बोर्ड कक्षा 10 - हिन्दी अनुवाद एवं प्रश्न-उत्तर
पाठ परिचय
यह पाठ महाकवि भास द्वारा रचित नाटक 'कर्णभार' से लिया गया है। इसमें महाभारत युद्ध के दौरान इंद्र (ब्राह्मण वेश में) द्वारा दानवीर कर्ण से कवच और कुंडल छलपूर्वक माँगने की घटना का वर्णन है। कर्ण अपनी मृत्यु निश्चित जानकर भी प्रसन्नतापूर्वक अपना रक्षा-कवच दान कर देते हैं।
नाट्यांश एवं हिन्दी अनुवाद
इंद्र का आगमन और आशीर्वाद
(ततः प्रविशति ब्राह्मणरूपेण शक्रः)
शक्रः (इंद्र): हे मेघों! सूर्य के साथ ही तुम लोग लौट जाओ। हे कर्ण! मैं बहुत बड़ी भिक्षा माँगता हूँ।
कर्णः: हे भगवन्! मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं कर्ण आपको प्रणाम करता हूँ।
शक्रः (मन में): यदि 'दीर्घायु हो' कहूँगा तो यह दीर्घायु हो जाएगा, नहीं कहूँगा तो मूर्ख समझेगा। (प्रकट में) हे कर्ण! तुम्हारा यश सूर्य, चन्द्रमा, हिमालय और सागर के समान (अमर) रहे।
कर्णः: भगवन्! आपने 'दीर्घायु हो' ऐसा क्यों नहीं कहा? खैर, यश का आशीर्वाद ही उत्तम है। क्योंकि राजाओं का शरीर नष्ट होने पर भी उनके गुण (यश) बने रहते हैं। बताइए, मैं आपको क्या दूँ?
दान का प्रस्ताव (गाय, घोड़े, हाथी, सोना)
शक्रः: मैं बहुत बड़ी भिक्षा माँगता हूँ।
कर्णः: मैं आपको आभूषणों सहित एक हज़ार गायें देता हूँ।
शक्रः: एक हज़ार गायें! दूध तो कुछ समय ही पिऊँगा। नहीं चाहिए कर्ण, नहीं चाहिए।
कर्णः: तो हज़ारों घोड़े देता हूँ।
शक्रः: घोड़े! कुछ समय ही सवारी करूँगा। नहीं चाहिए कर्ण, नहीं चाहिए।
कर्णः: तो हाथियों का समूह देता हूँ।
शक्रः: हाथी! कुछ समय ही सवारी करूँगा। नहीं चाहिए।
कर्णः: तो बहुत सारा सोना देता हूँ।
शक्रः: (थोड़ा आगे जाकर) नहीं चाहिए कर्ण, नहीं चाहिए।
अंतिम दान (पृथ्वी, यज्ञफल, सिर)
कर्णः: तो मैं पूरी पृथ्वी जीतकर देता हूँ।
शक्रः: पृथ्वी का क्या करूँगा?
कर्णः: तो अग्निष्टोम यज्ञ का फल देता हूँ।
शक्रः: यज्ञ के फल से मेरा क्या काम?
कर्णः: तो फिर मैं अपना सिर देता हूँ।
शक्रः: नहीं! नहीं! (डर का नाटक)
कर्णः: डरें नहीं। आप प्रसन्न हों। और भी सुनिए... (अंत में कर्ण अपना कवच-कुंडल देता है)।
1. शब्दार्थ (Word Meanings)
| संस्कृत शब्द | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| शक्रः | इन्द्र |
| महत्तराम् | बहुत बड़ी |
| वाजिनः | घोड़े |
| वारणः | हाथी |
| नेच्छामि | नहीं चाहता हूँ |
| भुजङ्गः | साँप |
अभ्यासः (मौखिक)
- 🔹 शक्रः कः आसीत्? (इंद्र कौन थे?) - इन्द्रः (देवराजः)
- 🔹 कर्णः कस्य देशस्य राजा? - अङ्गदेशस्य
- 🔹 कर्णः प्रथमं किं दातुम् इच्छति? (पहले क्या देना चाहा?) - गोसहस्रम् (हजार गायें)
- 🔹 महत्तरां भिक्षां कः याचते? (बड़ी भिक्षा कौन माँगता है?) - शक्रः (इन्द्र)
अभ्यासः (लिखित)
1. प्रश्न-निर्माण (रेखांकित पदों के स्थान पर)
- ततः प्रविशति शक्रः। → कः?
- महत्तरां भिक्षाम् याचे। → काम्?
- क्षीरं पिबामि। → किम्?
- पादपाः निपतन्ति। → के?
2. पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) ब्राह्मणरूपेण कः प्रविशति?
उत्तर: ब्राह्मणरूपेण शक्रः (इन्द्रः) प्रविशति।
(ख) कालपर्ययात् का क्षयं गच्छति?
उत्तर: कालपर्ययात् शिक्षा क्षयं गच्छति।
(ग) किं तथैव तिष्ठति?
उत्तर: हुतं च दत्तं च (हवन और दान) तथैव तिष्ठति।
3. व्याकरण विशेष
संधि-विच्छेद
- सूर्येणैव = सूर्येण + एव
- नेच्छामि = न + इच्छामि
- प्रीतोऽस्मि = प्रीतः + अस्मि
- अन्यदपि = अन्यत् + अपि
समास विग्रह
- दीर्घायुः - दीर्घम् आयुः यस्य सः (बहुव्रीहि)
- मच्छिरः - मम शिरः (षष्ठी तत्पुरुष)
- गोसहस्रम् - गवां सहस्रम् (षष्ठी तत्पुरुष)
सुविचार
"हुतं च दत्तं च तथैव तिष्ठति"
(समय बीतने पर सब नष्ट हो जाता है, लेकिन किया गया दान और हवन अमर रहता है।)
-- कक्षा 10 संस्कृत (बिहार बोर्ड) --
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