कक्षा 10
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11.नौबतखाने में इबादत Notes

अध्याय 11: नौबतखाने में इबादत

गोधूलि भाग-2 (व्यक्तिचित्र - यतीन्द्र मिश्र)

पाठ परिचय: प्रस्तुत पाठ 'नौबतखाने में इबादत' प्रसिद्ध शहनाई वादक और भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के जीवन पर आधारित एक व्यक्तिचित्र है। इसमें उनके बचपन, संघर्ष और संगीत के प्रति उनकी गहरी आस्था को दर्शाया गया है।

1. लेखक परिचय: यतीन्द्र मिश्र

परिचय: यतीन्द्र मिश्र का जन्म 1977 ई. में अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में हुआ। वे हिंदी के प्रसिद्ध कवि और संगीत कलाओं के जानकार हैं।

प्रमुख रचनाएँ:
  • काव्य संग्रह: 'यदा-कदा', 'अयोध्या तथा अन्य कविताएँ', 'ड्योढ़ी पर आलाप'।
  • विशेष: उन्होंने प्रसिद्ध गायिका 'गिरिजा देवी' के जीवन पर 'गिरिजा' नामक पुस्तक लिखी।
  • सम्मान: भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, रज़ा पुरस्कार।

2. बिस्मिल्ला खाँ का बचपन और डुमराँव

जन्म और नाम: बिस्मिल्ला खाँ का जन्म डुमराँव (बिहार) में हुआ था। बचपन का नाम अमीरुद्दीन था। उनके बड़े भाई का नाम शम्सुद्दीन था।

डुमराँव का महत्व: शहनाई बजाने के लिए जिस 'रीड' (नरकट) का प्रयोग होता है, वह डुमराँव में सोन नदी के किनारे पाई जाती है। इसलिए शहनाई की दुनिया में डुमराँव का नाम प्रसिद्ध है।

3. काशी और संगीत साधना

(क) बालाजी मंदिर का रियाज

काशी में रहते हुए, बिस्मिल्ला खाँ रोजाना बालाजी मंदिर (काशी विश्वनाथ) जाने के लिए एक खास रास्ते से जाते थे, जहाँ उन्हें रसूलन बाई और बतुलन बाई के गाने सुनाई देते थे। इन्हीं दोनों ने उनके मन में संगीत के प्रति प्रेम जगाया।

(ख) सच्चे सुर की दुआ

वे पांचों वक्त की नमाज में खुदा से एक ही चीज मांगते थे- "मेरे मालिक! मुझे एक सच्चा सुर बख्श दे।" उनका मानना था कि अगर सुर सच्चा होगा, तो उसकी तासीर से लोगों की आँखों से सच्चे मोती (आँसू) निकलेंगे।

4. मुहर्रम और गंगा-जमुनी तहजीब

मुहर्रम का शोक: मुहर्रम के दस दिनों तक उनके खानदान का कोई भी व्यक्ति न तो शहनाई बजाता था और न ही किसी संगीत कार्यक्रम में भाग लेता था।

  • आठवीं तारीख को वे खड़े होकर शहनाई बजाते थे और दालमंडी से फातमान तक 8 किलोमीटर पैदल रोते हुए जाते थे।
  • सांप्रदायिक सद्भाव: वे एक सच्चे मुसलमान थे, लेकिन काशी विश्वनाथ और बालाजी के प्रति उनकी श्रद्धा अपार थी। वे काशी छोड़कर कहीं नहीं जाना चाहते थे क्योंकि "गंगा मैया यहाँ हैं, बाबा विश्वनाथ यहाँ हैं।"

5. सादगी और फटी लुंगी

एक बार उनकी शिष्या ने उन्हें फटी हुई लुंगी पहनने पर टोका और कहा कि "बाबा, अब तो आपको भारत रत्न मिल गया है, फटी लुंगी मत पहना करें।"

खाँ साहब का जवाब: "धत पगली! ई भारत रत्न हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं। तुम लोगों की तरह बनाव-सिंगार देखते रहते, तो उम्र ही बीत जाती। मालिक से यही दुआ है- फटा सुर न बख्शें, लुंगी का क्या है, आज फटी है, तो कल सिल जाएगी।"

परीक्षा सारांश (Exam Highlights)

  • शीर्षक का अर्थ: नौबतखाना (प्रवेश द्वार के ऊपर मंगल ध्वनि बजाने का स्थान) + इबादत (पूजा/प्रार्थना)।
  • पसंदीदा हीरोइन: सुलोचना (बचपन में इनकी फिल्में देखने के लिए वे नानी से पैसे मांगते थे)।
  • पसंदीदा मिठाई: कुलसुम हलवाई की कचौड़ी-जलेबी।
  • शहनाई: इसे 'सुषिर वाद्य' (फूँक कर बजाए जाने वाले यंत्र) में 'शाह' (राजा) की उपाधि मिली है, इसलिए इसे 'शहनाई' (नय) कहते हैं।

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